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नज़्म
क़दम उठाना ही दुश्वार है तो ग़म क्या है
अंधेरा बरसर-ए-पैकार है तो ग़म क्या है
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
नज़्म
इक वो हैं जो करते हैं मह-ओ-मेहर को तस्ख़ीर
इक हम हैं कि रहते हैं फ़क़त बरसर-ए-पैकार
अमीर चंद बहार
नज़्म
लेकिन ये मैं क्या बड़ हाँकने बैठ गई
आमदन बरसर-ए-मतलब मैं साँपों के बारे में कुछ कहना चाहती हूँ