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नज़्म
हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा
सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
ये फिर भी तेरे बंदे हैं तिरी ही हम्द गाएँगे
इन्हें आँखें तो दे दी हैं बसारत भी इन्हें दे दे
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तुम्हारे लम्स की ख़ुशबू ने संदल कर दिया है
कि मैं पागल थी तुम ने और पागल कर दिया है