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नज़्म
तुम उन सारी औरतों से ज़ियादा ख़ूबसूरत हो
जिन्हों ने मेरे ख़यालात पर शो'लों का एक हाला सा बनाए रक्खा
इकराम बसरा
नज़्म
ये शहर चाहे हज़ार सदियों की जिद्दतों का लिबास पहने
यहाँ के बासी भले कोई भी ज़बान बोलें
इकराम बसरा
नज़्म
नवाह-ए-बसरा में फैलती बद-गुमान सुब्हें
फ़ज़ा में बे-नाम सिसकियों की शिकस्ता-लहरें
इलियास बाबर आवान
नज़्म
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उम्र-ए-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्द
फिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
रहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों को
किया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बरहना पाँव जलती रेत यख़-बस्ता हवाओं में
गुरेज़ाँ बस्तियों से मदरसों से ख़ानक़ाहों में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
वो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंद
तेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंद