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नज़्म
दाग़-ए-दिल 'फ़ारूक़' दिखला कर सर-ए-बज़्म-ए-जमाल
इन को आईना बनाने का ज़माना आ गया
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
आ 'जमाल'-ए-ज़ार को भी राज़दार-ए-दिल बना
ज़िंदगी इस की भी इक बर्क़-ए-दिल-ए-बिस्मिल बना
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
बज़्म-ए-अंजुम की हर एक तनवीर धुँदली हो गई
रख दिया नाहीद ने झुँझला के हाथों से सितार
इब्न-ए-सफ़ी
नज़्म
फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार
अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
'शेर' क्या अक़्ल ओ जुनूँ की मुश्तरक बज़्म-ए-जमाल
'शेर' क्या है इश्क़ ओ हिकमत का मक़ाम-ए-इत्तिसाल
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फ़ैज़ से तेरे ही है उर्दू का ये हुस्न-ए-जमाल
तेरे बाइ'स ही बनी वो रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
नोमान बद्र
नज़्म
हर आए दिन ये ख़ुदावंदगान-ए-मेहर-ओ-जमाल
लहू में ग़र्क़ मिरे ग़म-कदे में आते हैं