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नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
और गुलशन-ए-नुत्क़ बर्ग-ओ-बार-ओ-समर है
कि इस महबस-ए-फ़िक्र में ख़यालों की महशर-ख़िरामी
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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और गुलशन-ए-नुत्क़ बर्ग-ओ-बार-ओ-समर है
कि इस महबस-ए-फ़िक्र में ख़यालों की महशर-ख़िरामी