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नज़्म
जिधर नज़रें उठाता हूँ उधर चेहरे ही चेहरे हैं
मगर इन सब में इक बे-चेहरगी सी देखता हूँ मैं
अख़तर बस्तवी
नज़्म
जैसे कम-‘उम्र हाथों से फिसला हुआ फ़ैसला हो कोई
मुंतशिर सर्द बे-साख़्ता तीरा संगीं अमिट