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नज़्म
बे-इल्म-ओ-बे-हुनर है जो दुनिया में कोई क़ौम
नेचर का इक़तिज़ा है रहे बन के वो ग़ुलाम
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
बे-मेहर चेहरों की कई शामें नज़र के सामने
जैसे मताअ'-ए-नर्म दस्त-ए-बे-हुनर के सामने
जाबिर अली सय्यद
नज़्म
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
इस लिए मुझ से न पूछो कि सफ़-ए-याराँ में
क्यूँ ये दिल बे-हुनर-ओ-हुस्न-ओ-तमीज़ इतना है
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
न कोई बे-पढ़ा-लिखा न कोई बे-हुनर होगा
न औरों के लिए बे-कार कोई दर्द-ए-सर होगा