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नज़्म
शराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ की
सिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मय-कशों को नश्शा हो जाता है बे-जाम-ओ-सुबू
हुस्न की वो दिल-फ़रेब अंगड़ाइयाँ देहली में हैं
इज़हार मलीहाबादी
नज़्म
कल तलक जो देता था अपनी छाँव का शामियाना
आज वो पड़ा था ला-वारिस सा वो बे-जान शजर