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नज़्म
जा-ब-जा आबादियों में आग सी लग जाएगी
तोड़ कर बेड़ी निकल आएँगे ज़िंदाँ से असीर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
तेरी फ़ितरत में है 'गोबिंद' का आसार मगर
'इब्न-मरियम' का मुक़ल्लिद तिरा किरदार मगर
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
एक जिस्म-ए-ना-तवाँ इतनी दबाओं का हुजूम
इक चराग़-ए-सुब्ह और इतनी हवाओं का हुजूम
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
उस की सरहद में ग़ुलामों ने जो है रखा क़दम
और कंकर पाँव से एक इक के बेड़ी गिर पड़ी
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
वो 'कृष्ण' हों कि 'बेदी' 'चकबस्त' हों कि 'तालिब'
'महरूम' हों कि 'हाली' 'इक़बाल' हों कि 'ग़ालिब'
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
वफ़ा नामूस-ओ-इफ़्फ़त का शराफ़त और अज़्मत का
कि ये अक़दार मेरे पाँव की बेड़ी नहीं हरगिज़
तबस्सुम आज़मी
नज़्म
न होती कोई पाबंदी न होती फ़िक्र सरहद की
न कोई रोकता हम को न लगती पाँव में बेड़ी