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नज़्म
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का
जौन एलिया
नज़्म
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनिया में
सहमी हुई दो-शीज़ाओं की मुस्कान भी बेची जाती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कितना बेचैन उन्हें लेने को गँगा-जल था
जो भी धारा था उन्हीं के लिए वो बेकल था