aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bed"
(1)ऐ सब से अव्वल और आख़िरजहाँ-तहाँ, हाज़िर और नाज़िरऐ सब दानाओं से दानासारे तवानाओं से तवानाऐ बाला, हर बाला-तर सेचाँद से सूरज से अम्बर सेऐ समझे बूझे बिन सूझेजाने-पहचाने बिन बूझेसब से अनोखे सब से निरालेआँख से ओझल दिल के उजालेऐ अंधों की आँख के तारेऐ लंगड़े लूलों के सहारेनातियों से छोटों के नातीसाथियों से बिछड़ों के साथीनाव जहाँ की खेने वालेदुख में तसल्ली देने वालेजब अब तब तुझ सा नहीं कोईतुझ से हैं सब तुझ सा नहीं कोईजोत है तेरी जल और थल मेंबास है तेरी फूल और फल मेंहर दिल में है तेरा बसेरातू पास और घर दूर है तेराराह तिरी दुश्वार और सुकड़ीनाम तिरा रह-गीर की लकड़ीतू है ठिकाना मिस्कीनों कातू है सहारा ग़मगीनों कातू है अकेलों का रखवालातू है अँधेरे घर का उजालालागू अच्छे और बुरे काख़्वाहाँ खोटे और खरे काबेद निरासे बीमारों कागाहक मंदे बाज़ारों कासोच में दिल बहलाने वालेबिपता में याद आने वाले(2)ऐ बे-वारिस घरों के वारिसबे-बाज़ू बे-परों के वारिसबे-आसों की आस है तू हीजागते सोते पास है तू हीबस वाले हैं या बे-बस हैंतू नहीं जिन का वो बे-कस हैंसाथी जिन का ध्यान है तेरादुसरायत की वहाँ नहीं पर्वादिल में है जिन के तेरी बड़ाईगिनते हैं वो पर्बत को राईबेकस का ग़म-ख़्वार है तू हीबुरी बनी का यार है तू हीदुखिया दुखी यतीम और बेवातेरे ही हाथ उन सब का है खेवातू ही मरज़ दे तू ही दवा देतू ही दवा-दारू में शिफ़ा देतू ही पिलाए ज़हर के प्यालेतू ही फिर अमृत ज़हर में डालेतू ही दिलों में आग लगाएतू ही दिलों की लगी बुझाएचुम्कारे चुम्कार के मारेमारे मार के फिर चुम्कारेप्यार का तेरे पूछना क्या हैमार में भी इक तेरी मज़ा है(3)ऐ रहमत और हैबत वालेशफ़क़त और दबाग़त वालेऐ अटकल और ध्यान से बाहरजान से और पहचान से बाहरअक़्ल से कोई पा नहीं सकताभेद तिरे हुक्मों में हैं क्या क्याएक को तू ने शाद किया हैएक के दिल को दाग़ दिया हैउस से न तेरा प्यार कुछ ऐसाउस से न तू बेज़ार कुछ ऐसाहर दम तेरी आन नई हैजब देखो तब शान नई हैयहाँ पछुआ है वहाँ पुर्वा हैघर घर तेरा हुक्म नया हैफूल कहीं कुमलाए हुए हैंऔर कहीं फल आए हुए हैंखेती एक की है लहरातीएक का हर दम ख़ून सुखातीएक पड़े हैं धन को डुबोएएक हैं घोड़े बेच के सोएएक ने जब से होश सँभालारंज से उस को पड़ा न पालाएक ने इस जंजाल में आ करचैन न देखा आँख उठा करमेंह कहीं दौलत का है बरसताहै कोई पानी तक को तरसताएक को मरने तक नहीं देतेएक उकता गया लेते लेतेहाल ग़रज़ दुनिया का यही हैग़म पहले और ब'अद ख़ुशी हैरंज का है दुनिया के गिला क्यातोहफ़ा यही ले दे के है याँ कायहाँ नहीं बनती रंज सहे बिनरंज नहीं सब एक से लेकिनएक से यहाँ रंज एक है बालाएक से है दर्द एक निरालाघाव है गो नासूर की सूरतपर उसे क्या नासूर से निस्बततप वही दिक़ की शक्ल है लेकिनदिक़ नहीं रहती जान लिए बिनदिक़ हो वो या नासूर हो कुछ होदे न जो अब उम्मीद किसी कोरोज़ का ग़म क्यूँ-कर सहे कोईआस न जब बाक़ी रहे कोईतू ही कर इंसाफ़ ऐ मिरे मौलाकौन है जो बे-आस है जीतागो कि बहुत बंदे हैं पुर-अरमाँकम हैं मगर मायूस हैं जो याँख़्वाह दुखी है ख़्वाह सुखी हैजो है इक उम्मीद उस को बंधी हैखेतियाँ जिन की खड़ी हैं सूखीआस वो बाँधे बैठे हैं मेंह कीघटा जिन की असाड़ी में हैसावनी की उम्मीद नहीं हैडूब चुकी है उन की अगेतीदेती है ढारस उन को पछेतीएक है इस उम्मीद पे जीताअब हुई बेटी अब हुआ बेटाएक को जो औलाद मिली हैउस को उमंग शादियों की हैरंज है या क़िस्मत में ख़ुशी हैकुछ है मगर इक आस बंधी हैग़म नहीं उन को ग़मगीं हैंजो दिल ना-उमीद नहीं हैंकाल में कुछ सख़्ती नहीं ऐसीकाल में है जब आस समयँ कीसहल है मौजों से छुटकाराजब कि नज़र आता है किनारापर नहीं उठ सकती वो मुसीबतआएगी जिस के ब'अद न राहतशाद हो उस रह-गीर का क्या दिल?मर के कटेगी जिस की मंज़िलउन उजड़ों को कल पड़े क्यूँ-करघर न बसेगा जिन का जनम भरउन बिछड़ों का क्या है ठिकाना?जिन को न मिलने देगा ज़मानाअब ये बला टलती नहीं टालीमुझ पे है जो तक़दीर ने डालीआईं बहुत दुनिया में बहारेंऐश की घर घर पड़ीं पुकारेंपड़े बहुत बाग़ों में झूलेढाक बहुत जंगल में फूलेगईं और आएँ चाँदनी रातेंबरसीं खुलीं बहुत बरसातेंपर न खिली हरगिज़ न खिलेगीवो जो कली मुरझाई थी दिल कीआस ही का बस नाम है दुनियाजब न रही यही तो रहा क्या?ऐसे बिदेसी का नहीं ग़म कुछजिस को न हो मिलने की क़सम कुछरोना उन बन-बासियों का हैदेस निकाला जिन को मिला हैहुक्म से तेरे पर नहीं चाराकड़वी मीठी सब है गवाराज़ोर है क्या पत्ते का हवा परचाहे जिधर ले जाए उड़ा करतिनका इक और सात समुंदरजाए कहाँ मौजों से निकल करक़िस्मत ही में जब थी जुदाईफिर टलती किस तरह ये आई?आज की बिगड़ी हो तो बने भीअज़ल की बिगड़ी ख़ाक बनेगीतू जो चाहे वो नहीं टलताबंदे का याँ बस नहीं चलतामारे और न दे तू रोनेथपके और न दे तू सोनेठहरे बन आती है न भागेतेरी ज़बरदस्ती के आगेतुझ से कहीं गर भागना चाहेंबंद हैं चारों खूँट की राहेंतू मारे और ख़्वाह नवाज़ेपड़ी हुई हूँ मैं तेरे दरवाज़ेतुझ को अपना जानती हूँ मैंतुझ से नहीं तो किस से कहूँ मैंमाँ ही सदा बच्चे को मारेऔर बच्चा माँ माँ ही पुकारे(4)ऐ मिरे ज़ोर और क़ुदरत वालेहिकमत और हुकूमत वालेमैं लौंडी तेरी दुखयारीदरवाज़े की तेरी भिकारीमौत की ख़्वाहाँ जान की दुश्मनजान अपनी है आप अजीरनअपने पराए की धुत्कारीमैके और ससुराल पे भारीसह के बहुत आज़ार चली हूँदुनिया से बेज़ार चली हूँदिल पर मेरे दाग़ हैं जितनेमुँह में बोल नहीं हैं उतनेदुख दिल का कुछ कह नहीं सकतीइस के सिवा कुछ कह नहीं सकतीतुझ पे है रौशन सब दुख दिल कातुझ से हक़ीक़त अपनी कहूँ क्याब्याह के दम पाई थी न लेनेलेने के याँ पड़ गए देनेख़ुशी में भी दुख साथ न आयाग़म के सिवा कुछ हात न आयाएक ख़ुशी ने ग़म ये दिखाएएक हँसी ने गुल ही खिलाएकैसा था ये ब्याह निनावाँजूँही पड़ा इस का परछावाँचैन से रहने दिया न जी कोकर दिया मलियामेट ख़ुशी कोरो नहीं सकती तंग हूँ याँ तकऔर रोऊँ तो रोऊँ कहाँ तकहँस हँस दिल बहलाऊँ क्यूँ-करओसों प्यास बुझाऊँ क्यूँ-करएक का कुछ जीना नहीं होताएक न हँसता भला न रोतालेटे गर सोने के बहानेपाएनती कल है और न सिरहानेजागिये तो भी बन नहीं पड़तीजागने की आख़िर कोई हद भीअब कल हम को पड़ेगी मर करगोर है सूनी सेज से बेहतरबात से नफ़रत काम से वहशतटूटी आस और बुझी तबीअतआबादी जंगल का नमूनादुनिया सूनी और घर सूनादिन है भयानक और रात डरानीयूँ गुज़री सारी ये जवानीबहनें और बहनेलियाँ मेरीसाथ की जो थीं खेलियाँ मेरीमिल न सकीं जी खोल के मुझ सेख़ुश न हुईं हँस बोल के मुझ सेजब आईं रो-धो के गईं वोजब गईं बे-कल हो के गईं वोकोई नहीं दिल का बहलावाआ नहीं चुकता मेरा बुलावाआठ पहर का है ये जुलापाकाटूँगी किस तरह रँडापाथक गई दुख सहते सहतेथम गए आँसू बहते बहतेआग खुली दिल की न किसी परघुल गई जान अंदर ही अंदरदेख के चुप जाना न किसी नेजान को फूँका दिल की लगी नेदबी थी भोभल में चिंगारीली न किसी ने ख़बर हमारीक़ौम में वो ख़ुशियाँ बियाहों कीशहर में वो धोएँ साहों कीत्यौहारों का आए दिन आनाऔर सब का त्यौहार मनानावो चैत और फागुन की हवाएँवो सावन भादों की घटाएँवो गर्मी की चाँदनी रातेंवो अरमान भरी बरसातेंकिस से कहूँ किस तौर से काटेंख़ैर कटें जिस तौर से काटेंचाव के और ख़ुशियों के समय सबआते हैं ख़ुश कल जान को हो जबरंज में हैं सामान ख़ुशी केऔर जलाने वाले ही केघर बरखा और पिया बिदेसीआइयो बरखा कहीं न ऐसीदिन ये जवानी के कटे ऐसेबाग़ में पंछी क़ैद हो जैसेरुत गई सारी सर टकरातेउड़ न सके पर होते सारेकिसी ने होगी कुछ कल पाईमुझे तो शादी रास न आईआस बंधी लेकिन न मिला कुछफूल आया और फल न लगा कुछरह गया दे कर चाँद दिखाईचाँद हुआ पर ईद न आईफल की ख़ातिर बर्छी खाईफल न मिला और जान गँवाईरेत में ज़र्रे देख चमकतेदौड़ पड़ी में झील समझ केचारों खूँट नज़र दौड़ाईपर पानी की बूँद न पाई
आह जब दिल से निकलती है असर रखती हैगुलशन-ए-ज़ीस्त जलाने को शरर रखती हैतोप तलवार न ये तेग़-ओ-तबर रखती हैबिंत-ए-हव्वा की तरह तीर-ए-नज़र रखती हैइतना पुर-सोज़ हुआ नाला-ए-सफ़्फ़ाक मिराकर गया दिल पे असर शिकवा-ए-बेबाक मिराये कहा सुन के ससुर ने कि कहीं है कोईसास चुपके से ये बोलीं कि यहीं है कोईसालियाँ कहने लगीं क़ुर्ब-ओ-क़रीं है कोईसाले ये बोले कि मरदूद-ओ-लईं है कोईकुछ जो समझा है तो हम-ज़ुल्फ़ के बेहतर समझामुझ को बेगम का सताया हुआ शौहर समझाअपने हालात पे तुम ग़ौर ज़रा कर लो अगरजल्द खुल जाएगी फिर सारी हक़ीक़त तुम परमैं ने उगने न दिया ज़ेहन में नफ़रत का शजरतुम पे डाली है सदा मैं ने मोहब्बत की नज़रकह के सरताज तुम्हें सर पे बिठाया मैं नेतुम तो बेटे थे फ़क़त बाप बनाया मैं नेमैं ने ससुराल में हर शख़्स की इज़्ज़त की हैसास ससुरे नहीं ननदों की भी ख़िदमत की हैजेठ देवर से जेठानी से मोहब्बत की हैमैं ने दिन रात मशक़्क़त ही मशक़्क़त की हैफिर भी होंटों पे कोई शिकवा गिला कुछ भी नहींमेरे दिन रात की मेहनत का सिला कुछ भी नहींसुब्ह-दम बच्चों को तय्यार कराती हूँ मैंनाश्ता सब के लिए रोज़ बनाती हूँ मैंबासी तुम खाते नहीं ताज़ा पकाती हूँ मैंछोड़ने बच्चों को स्कूल भी जाती हूँ मैंमैं कि इंसान हूँ इंसान नहीं जिन कोईमेरी तक़दीर में छुट्टी का नहीं दिन कोईवो भी दिन थे कि दुल्हन बन के मैं जब आई थीसाथ में जीने की मरने की क़सम खाई थीप्यार आँखों में था आवाज़ में शहनाई थीकभी महबूब तुम्हारी यही हरजाई थीअपने घर के लिए ये हस्ती मिटा दी मैं नेज़िंदगी राह-ए-मोहब्बत में लुटा दी मैं नेकिस क़दर तुम पे गिराँ एक फ़क़त नारी हैदाल रोटी जिसे देना भी तुम्हें भारी हैमुझ से कब प्यार है औलाद तुम्हें प्यारी हैतुम ही कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैघर तो बीवी से है बीवी जो नहीं घर भी नहींये डबल बेड ये तकिया नहीं चादर भी नहींमैं ने माना कि वो पहली सी जवानी न रहीहर शब-ए-वस्ल नई कोई कहानी न रहीक़ुल्ज़ुम-ए-हुस्न में पहली सी रवानी न रहीअब मैं पहले की तरह रात की रानी न रहीअपनी औलाद की ख़ातिर मैं जवाँ हूँ अब भीजिस के क़दमों में है जन्नत वही माँ हूँ अब भीथे जो अज्दाद तुम्हारे न था उन का ये शिआरतुम हो बीवी से परेशान वो बीवी पे निसारतुम क्या करते हो हर वक़्त ये जो तुम बेज़ारतुम हो गुफ़्तार के ग़ाज़ी वो सरापा किरदारअपने अज्दाद का तुम को तो कोई पास नहींहम तो बेहिस हैं मगर तुम भी तो हस्सास नहींनहीं जिन मर्दों को परवा-ए-नशेमन तुम होअच्छी लगती है जिसे रोज़ ही उलझन तुम होबन गए अपनी गृहस्ती के जो दुश्मन तुम होहो के ग़ैरों पे फ़िदा बीवी से बद-ज़न तुम होफिर से आबाद नई कोई भी वादी कर लोकिसी कलबिस्नी से अब दूसरी शादी कर लो
ग़ैर की हो के भी तुम मेरी मोहब्बत चाहोइस घटा-टोप अँधेरे में ये तारे कैसेफ़र्श पर जिस को अभी तक न मिली जाए पनाहअर्श से चाँद का ऐवान उतारे कैसेजिस की राहों पे भटकते हुए जग बीते हैंफिर उसी दश्त को बद-बख़्त सुधारे कैसेक़ाफ़िले आए गए गर्द उठी बैठ गईअब मुसाफ़िर को उफ़ुक़ पर से इशारे कैसेजिन की तक़दीर में था दामन-ए-गुलचीं का मज़ारवो शगूफ़े तो पराए हैं हमारे कैसेपेश कर सकता हूँ लेकिन तुझे बहलाने कोचाँदनी-रात में मचले हुए रूमान की यादबेद-ए-मजनूँ के तिलिस्मात से पल-पल छनतीआसमानों को लपकती हुई इक तान की यादमेरी वारफ़्तगी-ए-शौक़ की सुन कर रूदादतिरी आँखों में दमकते हुए अरमान की याददोनों चेहरों पे शफ़क़ दोनों जबीनों पे अरक़दोनों सीनों में धड़कते हुए हैजान की यादकौन हैं आप मिरी ज़ीस्त की तन्हाई साथीपहली पहचान की याद आख़िरी पैमान की याद
बरसों बा'द जब उस को देखा फूल सा चेहरा बदल चुका थापेशानी पर फ़िक्र की आयत आँखें अब संजीदा थींहोंट कँवल अब भी वैसे पर शादाबी कुछ कम कम थीपक्के फलों का बोझ उठाए जिस्म तना बल खाता थारंगीं पैराहन में अब भीख़्वाब की सूरत लगती थीजाने कैसी कैसी हिकायत देख उसे याद आती थीपहली दफ़अ' जब साथ थे बैठे क्लास के अंदर हम दोनोंउस के जिस्म के लम्स ने मुझ कोपहले तो बुलाया था फिर पक्का दोस्त बनाया थाशाम तलक मेले में कैसे फिरते रहे थे इधर-उधररात गए मम्मी ने उस को खोटी-खरी सुनाई थीरेल के अंदर बैठ के कैसे शरमाए घबराए थेबग़ैर टिकट के पहुँच के घर पर कितनी मौज मनाई थीदोपहर को ढाबे मेंचाय और सिगरेट के साथथोड़े से रूमानी हो करक्या क्या बातें करते थेघर के बाहर लॉन भी होगा गेंदा और गुल-मोहर के फूलखरी खाट नहीं रखेंगे बेड बड़े महँगे होंगेसूट मिरा ऐसा होगा तेरी सारी रेशम कीबेटे का जो नाम रखेंगे हिन्दू न मुस्लिम होगाबिल चुकाते वक़्त में अक्सर पैसे कम पड़ जाते थेदेख के दद्दू हँसता था फिरजाने क्यूँ ख़ुश होता थाकोई बात नहीं है बेटेकल जब आओ दे जानाजाते हुए जब सेठ ने उस की कमर में बाज़ू पहनायादेख के उस की आँखें मुझ को छलक पड़ी थीं चुप के सेसोच रहा था पलट के अब वोपूछेगी तुम कैसे होये है आप की कॉफ़ी साहब और भी कुछ चहिए होगा
बे-ज़बान गुड़ियों सेजिन की आँख धागे कीजिन के होंट रेशम केअपने दिल की सब बातेंबारहा बताती हैंऔर वक़्त से पहलेसब रुमूज़ जीने केआप सीख जाती हैं
मैं ख़्वाब देखता हूँऔर इन्हें काग़ज़ पर लिखता हूँकभी आधाकभी पूराऔर कभी पूरे से भी ज़ियादाकभी कभी तो ख़्वाब इतने ज़ियादा हो जाते हैंकि काग़ज़ से बह करज़मीन परया मेरे कपड़ों परया बेड-शीट परकभी कभी तो नाश्ते की मेज़ पर भी गिर जाते हैंजिन्हें समेटना एक मुश्किल काम है
रहा वो जिरगा जिसे चर गई है अंग्रेज़ीसो वाँ ख़ुदा की ज़रूरत न अंबिया दरकारवो आँख मीच के बर-ख़ुद ग़लत बने ऐसेकि एशिया की हर इक चीज़ पर पड़ी धुत्कारजो पोशिशों में है पोशिश तो पस-दरीदा-कोटसवारियों में सवारी तो दुम-कटा रहवारजो अर्दली में है कुत्ता तो हाथ में इक बेदबजाते जाते हैं सीटी सुलग रहा है सिगारवो अपने-आप को समझे हुए हैं जेंटलमैनऔर अपनी क़ौम के लोगों को जानते हैं गंवारन कुछ अदब है न अख़्लाक़ ने ख़ुदा-तरसीगए हैं उन के ख़यालात सब समुंदर पारवो अपने ज़ोम में लिबरल हैं या रीडीकल हैंमगर हैं क़ौम के हक़ में ब-सूरत-ए-अग़्यारन इंडिया में रहे वो न वो बने इंग्लिशन उन को चर्च में ऑनर न मस्जिदों में बारन कोई अलम न सनअत न कुछ हुनर न कमालतमाम क़ौम के सर पर सवार है अदबार
बना के मुँह तू मिरे सामने खड़ी क्या हैमुझे बता तू किसी से अभी लड़ी क्या हैसमझ रहा हूँ चली आई है जगाने मुझेज़रा सा और ठहर जाती हड़बड़ी क्या हैअभी न पूरी हुई नींद दस बजे कैसेहमेशा तेज़ जो चलती रहे घड़ी क्या हैघड़ी को डॉक्टर साहब के पास ले जाओउन्हें दिखाओ इसे इस में गड़-बड़ी क्या हैअभी क्लास नया है नई किताबें हैंपढ़ें अभी से भला फ़िक्र ही पड़ी क्या हैपढ़ाने आएँगे हिन्दी हमारे पंडित जीमगर बताएँगे इंग्लिश में गड़-बड़ी क्या हैमुझे शुरूअ' से आदत है बेद खाने की'शमीम'-हाशमी साहब की ये छड़ी क्या है
बजी घंटी जो छुट्टी की तो हँसते गाते हम निकलेकिसी मोटे से मौला-बख़्श के सह कर सितम निकलेबताओ हाथ पर पड़ने से उस का हाल क्या होगानज़र आ जाते हैं जिस बेद के हम सब का दम निकलेकभी जब भूल कर बस्ते को अपने खोल कर बैठेफटी निकलीं किताबें और सब टूटे क़लम निकलेनतीजा-गाह से निकले तो इस हालत में हम निकलेकि ले कर अपने दिल में फ़ेल हो जाने का ग़म निकलेबहाना टाँग की तकलीफ़ का ऐसा किया हम नेकि लंगड़ाते चले और गिर पड़े जब दो क़दम निकलेनिकाला मुम्तहिन ने नक़्ल करने से तो बोले हमबहुत बे-आबरू हो कर तिरे कमरे से हम निकले
आधे बेड पर सोने वालेख़्वाब का दुख क्या होता है
वक़्त-ए-सहरा और तंग हुआ हैबे-मय सब किरकिरा मज़ा है
वो अपनी पसंदीदा लिपस्टिकपिस्तौल की नोक से लगाती हैकई तरह के पसीनों की ख़ुशबुओं सेउस की ड्रेसिंग टेबल भरी रहती हैउसे लिफ़ाफ़ों को बोसों सेबंद करने की पुरानी आदत हैख़्वाह डाकिया उन्हें ख़ुद पढ़ लेउस की अलमारीजाग कर बदले जाने वाले कपड़ों सेख़ाली ख़ालीचाँद उसे अपने माथेऔर सितारे कलाई पर बाँधने से फ़ुर्सत नहींनाश्ते की मेज़ पर अख़बार में उसेगुज़िश्ता शब की सुर्ख़ी पसंद हैऔर ख़ादिमों में कुत्तेकिसी नए मेहमान को ख़ुश-आमदीद कहने कोहर ब्रांड का सिगरेटउस ने शाम से पहले ही ले रखा हैवो अल्कोहल की बोतलअपने बेड के बाएँ तरफ़खिड़की के सामने छुपाए रखती हैरात गए एक सेब और ख़ंजरउस के सिरहाने चमकते हैंऔर अंधेरे उस का लिबास बनेसारी रात बदन चाट करसुब्ह की रौशनी तय्यार करते रहते हैं
इस बात से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ताकि मरने वाला ज़िंदगी से नबर्द-आज़मा किसी शाएरा या शाएर का बेटा थाया राज-पूत नस्ल का कोई ज़िंदा-दिल माज़ूल शहज़ादाया मरने वाले जवान बेटे का नाम कबीर, तारिक़ अहद या कुछ और थाजवान बेटे की मौतइंसान को पानी में हलाक करने पर मामूर फ़रिश्ते ने लीया ख़ुश्की पर इंसानी रूह क़ब्ज़ करने के मजाज़ फ़रिश्ते नेऐसी या ऐसी किसी भी बात सेकोई फ़र्क़ नहीं पड़ताक्यूँकि मौत का फ़रिश्ता तीनों मक़ामात परजवान बेटे को माँ बाप से जुदा करने में नाकाम रहामौत का फ़रिश्ता लगा रहता है दिन रातअपनी नाकामी का इंतिक़ाम लेने मेंटुकड़े टुकड़े करता रहता हैमाँ बाप का दिलजैसे काटा जाता है मशीन के तेज़ धार बलेड सेमवेशियों का चाराकोड़े मारता रहता है माँ बाप की ज़ख़्मी रूह को बरहना कर केईजाद करता रहता है नित-नए तरीक़ेमाँ बाप के बचे-खुचे दिल को अज़िय्यत पहुँचाने केमौत का फ़रिश्ता दाख़िल हो जाता है बग़ैर इजाज़तकिसी शाएर के बेड-रूम में रात ख़राब करनेमजबूर कर देता है शाएर कोज़ख़्मों से कराहती नज़्म लिखने पर
तू मुझे गोद में ले के यारों अज़ीज़ों में बाज़ार-ओ-दफ़्तर को जातामुझे याद है येशहर की नीम तारीक गलियों में अक्सर मैं सुनता था इक डर की चाप अपने पीछे से आतीमेरे बचपन की शफ़्फ़ाफ़ मासूम आँखों में ना-मेहरबाँ जाने पहचाने चेहरों का डर थामेरे दिल का ये शीशा इक अन-होने डर से तड़ख़ सा गया था कि जिस की सदा तक नहीं थीये वो डर था कि जिस की कोई एक तशरीह मुमकिन नहीं थीमगर मेरे कच्चे से दिल मेंएक आसेबी पीपल की जड़ थी मुझ को तू इक दिन इन्ही में अकेला छोड़ देगाजिस की शाख़ें हिरासाँ निगाहों से निकली वो शाख़ें मुझे बेद-ए-मजनूँ सा लरज़ाए रखतींतेरा सीना वो दीवार-ए-काबा था जिस से चिमट कर मैं दुनिया के हर ग़म से बेगाना होतातेरे मुशफ़िक़ दो लब गोया बाब-ए-हरम थेवो बोसा नहीं था हलावत का दर इक खुला थाजिस से शीरीं लताफ़त में गूंधी तमाज़त मिरे दिन को ताबाँ मिरी रात को गर्म रखतीडर अँधेरे का डर शहर की तंग-ओ-तारीक गलियों का डर मेरे बचपन का हिस्सा रहा हैडर वो स्कूल के रास्ते में खड़े एक मजहूल इंसाँ का डर जिस को ख़ुद हम से डर थाडर वो मतरूक बालीं पे डेरा किए कुछ चुड़ैलों का डर जो हमेशा का क़िस्सा रहा हैख़ैर ये डर तो बचपन का हिस्सा हुए बे-मुरव्वत शनासा से चेहरों का डर है अभी भीमेरे अंदर का सहमा सा बच्चा वो दीवार-ए-काबा अभी ढूँढता है कि जिस में अमाँ थीआज दफ़्तर सलामत है बाज़ार-ओ-कूचे की रौनक़ वही हैवो दीवार-ए-काबा मगर अब नहीं हैमैं नवम्बर के उस सर्द दिन में ठिठुरता हूँ अब भी कि जब तू अकेला मुझे कर गया था
पंद्रह रोज़ अलालत के, ऐसे गुज़रे जिन में बाहम राब्ता न थाफैल गया इक तन्हा दिन तब दूसरे तन्हा दिन से मिलाधीरे धीरे ईंट पे ईंट जमीमेरे चारों तरफ़ दीवार बनीपंद्रह रोज़ के बाद कहीं ये ज़िंदाँ टूटावापस लौटा अपनी दुनिया मेंसब कुछ वैसे ही पड़ा है जैसे छोड़ गया थामेज़ उसी तरह तिरछी रक्खी हैरैक से एक किताब निकाली थी यूँही खुली पड़ी हैधूप उतरती धूप मिरी अलमारी के आधे पट पर रुकी हुई हैअब वो यहीं से वापस हो जाएगीजैसे उस की हदें हमेशा से मुक़र्रर हैंजैसे मेरे होने न होने का कोई फ़र्क़ नहींखिड़की से फिर वही हवाएँ लौट आईं हैंमेरे सीने में जो साँस की सूरत तैर चुकी हैंबीते पंद्रह दिनों में शायद वो अज्दाद की तस्कीं का सामान बनी होंवो ख़ुश हों मेरे सीने के भत्ते से उन का तनफ़्फ़ुस चलता हैमिरे ज़रिये वो इस दुनिया में अब भी जारी और सारी हैंलेकिन अब तो उन का शजर दूर दूर तक फैल गया हैउन के जारी-सारी रहने का एहसास मिरे होने न होने का पाबंद नहींमैं जो नहीं था सब कुछ वैसे ही रुका पड़ा हैबेड से एक अधूरा ख़त अब भी झाँक रहा हैये ख़त मैं ने तुम को लिक्खा थाकमरे के गोशे में दुबका सन्नाटामेरा हमेशा का हमराज़ वही सन्नाटा लौट आया हैसरगोशी में मुझ से कहता हैतुम इस ख़त से उम्र में पंद्रह रोज़ बड़े होउस दिन वो सारी बातें कितनी सच्ची थीं!वो सच्चाई अटल हैवहीं खड़ी हैमेरी सारी नज़्मों की मानिंदजो मेरी बीती साँसों का कतबा हैंज़िंदा हैं पाइंदा हैंमेरे होने न होने की पाबंद नहीं
गंधी-पीस-फ़ाउंडेशन केऊँची छत वाले कमरे में पड़ीसोच रही थीमैं कल ईद कैसे मनाऊँगी?कि ज़मीन फट गईभौंचाल इतना तेज़ थामैं बेड से गिर कर फ़र्श पे आईबिल्कुल वैसे हीजैसे पिछली चाँद रात को तुम नेमेरे हाथों मेंचूड़ियाँ चढ़ाते हुएमुझे फ़र्श पे गिराया थाफिर ईद के दिन भी तुम ने झूट बोला थाऔर तुम्हारे झूट बोलने परसच की ज़बान ज़ब्ह कर केमैं ने जो क़ुर्बानी दी थीक्या ईद मनाने के लिए काफ़ी नहींये सोचते हुएऊँची छत वाले कमरे मेंचाँद रात गुज़र गई
घर में दाख़िल होते हीहम ख़ुद को आवाज़ें देने लगते हैंऔर कपड़ों से भरा शॉपिंग बैगफेंक देते हैं बेड के नीचेरखते हैं अपने जूते सोफ़े परऔर अलमारी के दराज़ से कच्चे अमरूद निकाल करबेड-शीट से रगड़ते हैंऔर कतरने लगते हैं चार दिन पुराने बिस्कुटजब भी नज़र पड़ती है आइने पेख़ुद को गालियाँ देते हैंटीवी से टों टों की आवाज़ आने पररेमोट के सात टुकड़े कर केबिल्ली के आगे डाल देते हैंक्रेडिट ख़त्म हो जाने परसेल-फोन पे शीरीं लहजे वाली दोशीज़ा कोखरी खरी सुनाते हैंऔर फ्रीज़ के निचले दरवाज़े को ज़ोर से बंद कर केख़ाली ओवन में सो जाते हैं
रात कई दिनों से ग़ाएब थीसख़्त कोहरे की दबीज़ साअ'तों मेंहल्क़ मेंरम की एक पूरी बोतल झोंक केसार्जेंटरात की विजिलेन्स पे निकलारात कई रातों से ग़ाएब थीलौटा आठ घंटे के बा'दख़ाली हाथ मुज़्महिल निढाल साअपने घरदेखा रात बे लिबासउस के सामनेपलंग पर पड़ी हुई थीगाड़ रहा था सूरजअपना नेज़ाउस के ख़ुफ़िया क़ुफ़्ल मेंबेड-रूम की खिड़की के एक शीशे परपानी की एक बे-रब्त लकीरधीरे धीरे गिर रही थीउस के ख़ाली हाथों से होते हुएउस की पैंट के अगले हिस्से मेंअड़े हुए क़लम के पाससख़्त दबीज़ कोहरे की साअ'तों मेंहल्क़ मेंरम की एक पूरी बोतल झोंक केसार्जेंटरात की विजिलेन्स पे निकलारात कई दिनों से ग़ाएब थी
उस ने सोचायाद-गारी चौक में चारों तरफ़ये बोलते बाज़ार हैंइस लिए अफ़्सुर्दगी में गुम खड़ेउस बेद-ए-मजनूँ परनज़र पड़ती नहींजो अकेला रह गया है क़िस्सा-ख़्वानों में यहाँबे-रंग उखड़ती छाल परचाक़ू से कंदा नाम फीका पड़ गया हैकंदा-कारी जा मिली है ख़ाक सेवक़्त की ग़फ़लत ने क्या साबित कियाज़ख़्म खाने और लगाने वालों मेंकौन फ़तह-याब हैं
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