aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bekaar"
ये तिरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्दअपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमारचाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्तेकि बख़्शा गया जिन को ज़ौक़-ए-गदाईज़माने की फटकार सरमाया इन काजहाँ भर की धुत्कार इन की कमाई
अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासाँ हूँ मैंअपने गुज़रे हुए अय्याम से नफ़रत है मुझेअपनी बे-कार तमन्नाओं पे शर्मिंदा हूँअपनी बे-सूद उमीदों पे नदामत है मुझे
उन हसीनाओं के नामजिन की आँखों के गुलचिलमनों और दरीचों की बेलों पे बे-कार खिल खिल केमुरझा गए हैंउन बियाहताओं के नामजिन के बदनबे मोहब्बत रिया-कार सेजों पे सज सज के उक्ता गए हैंबेवाओं के नामकटड़ियों और गलियों मोहल्लों के नामजिन की नापाक ख़ाशाक से चाँद रातोंको आ आ के करता है अक्सर वज़ूजिन के सायों में करती है आह-ओ-बुकाआँचलों की हिनाचूड़ियों की खनककाकुलों की महकआरज़ू-मंद सीनों की अपने पसीने में जुल्ने की बू
वो वक़्त मिरी जान बहुत दूर नहीं हैजब दर्द से रुक जाएँगी सब ज़ीस्त की राहेंऔर हद से गुज़र जाएगा अंदोह-ए-निहानीथक जाएँगी तरसी हुई नाकाम निगाहेंछिन जाएँगे मुझ से मिरे आँसू मिरी आहेंछिन जाएगी मुझ से मिरी बे-कार जवानी
उम्रों की मसाफ़त सेथक-हार गए आख़िरसब अह्द अज़िय्यत केबेकार गए आख़िरअग़्यार की बाँहों मेंदिलदार गए आख़िररो कर तिरी क़िस्मत कोग़म-ख़्वार गए आख़िर
चलो छोड़ोमोहब्बत झूट हैअहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों कातलब सूखे हुए पत्तों का बे-रौनक़ जज़ीरा हैख़लिश दीमक-ज़दा औराक़ पर बोसीदा सतरों का ज़ख़ीरा हैख़ुम्मार-ए-वस्ल तपती धूप के सीने पे उड़ते बादलों की राएगाँ बख़्शिश!ग़ुबार-ए-हिज्र-ए-सहरा में सराबों से अटे मौसम का ख़म्याज़ाचलो छोड़ोकि अब तक मैं अँधेरों की धमक में साँस की ज़र्बों पेचाहत की बिना रख कर सफ़र करता रहा हूँगामुझे एहसास ही कब थाकि तुम भी मौसमों के साथ अपने पैरहन के रंग बदलोगीचलो छोड़ोवो सारे ख़्वाब कच्ची भरभरी मिट्टी के बे-क़ीमत घरौंदे थेवो सारे ज़ाइक़े मेरी ज़बाँ पर ज़ख़्म बन कर जम गए होंगेतुम्हारी उँगलियों की नरम पोरें पत्थरों पर नाम लिखती थीं मिरा लेकिनतुम्हारी उँगलियाँ तो आदतन ये जुर्म करती थींचलो छोड़ोसफ़र में अजनबी लोगों से ऐसे हादसे सरज़द हुआ करते हैं सदियों सेचलो छोड़ोमिरा होना न होना इक बराबर हैतुम अपने ख़ाल-ओ-ख़द को आईने में फिर निखरने दोतुम अपनी आँख की बस्ती में फिर से इक नया मौसम उतरने दोमिरे ख़्वाबों को मरने दोनई तस्वीर देखोफिर नया मक्तूब लिखोफिर नए मौसम नए लफ़्ज़ों से अपना सिलसिला जोड़ोमिरे माज़ी की चाहत राएगाँ समझोमिरी यादों से कच्चे राब्ते तोड़ोचलो छोड़ोमोहब्बत झूट हैअहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों का
जब दुख की नदिया में हम नेजीवन की नाव डाली थीथा कितना कस-बल बाँहों मेंलोहू में कितनी लाली थीयूँ लगता था दो हाथ लगेऔर नाव पूरम पार लगीऐसा न हुआ, हर धारे मेंकुछ अन-देखी मंजधारें थींकुछ माँझी थे अंजान बहुतकुछ बे-परखी पतवारें थींअब जो भी चाहो छान करोअब जितने चाहो दोश धरोनदिया तो वही है, नाव वहीअब तुम ही कहो क्या करना हैअब कैसे पार उतरना हैजब अपनी छाती में हम नेइस देस के घाव देखे थेथा वेदों पर विश्वाश बहुतऔर याद बहुत से नुस्ख़े थेयूँ लगता था बस कुछ दिन मेंसारी बिपता कट जाएगीऔर सब घाव भर जाएँगेऐसा न हुआ कि रोग अपनेकुछ इतने ढेर पुराने थेवेद इन की टोह को पा न सकेऔर टोटके सब बे-कार गएअब जो भी चाहो छान करोअब जितने चाहो दोश धरोछाती तो वही है, घाव वहीअब तुम ही कहो क्या करना हैये घाव कैसे भरना है
यूँ तो हर रिश्ते का अंजाम यही होता हैफूल खिलता हैमहकता हैबिखर जाता हैतुम से वैसे तो नहीं कोई शिकायतलेकिनशाख़ हो सब्ज़तो हस्सास फ़ज़ा होती हैहर कली ज़ख़्म की सूरत ही जुदा होती हैतुम नेबे-कार ही मौसम को सताया वर्नाफूल जब खिल के महक जाता हैख़ुद-ब-ख़ुदशाख़ से गिर जाता है
जब आधा दिन ढल जाता है तो घर से अफ़सर आता हैऔर अपने कमरे में मुझ को चपरासी से बुलवाता हैयूँ कहता है वूँ कहता है लेकिन बेकार ही रहता हैमैं उस की ऐसी बातों से थक जाता हूँ थक जाता हूँपल-भर के लिए अपने कमरे को फ़ाइल लेने आता हूँऔर दिल में आग सुलगती है मैं भी जो कोई अफ़सर होताइस शहर की धूल और गलियों से कुछ दूर मिरा फिर घर होताऔर तू होतीलेकिन मैं तो इक मुंशी हूँ तू ऊँचे घर की रानी हैये मेरी प्रेम-कहानी है और धरती से भी पुरानी है
इक मंज़िल के लिएकितनी मंज़िलें तय करता हैइंसान यहाँदो ढाई गज़ ज़मीं के लिएकितनी मुश्किलें सर करता हैइंसान यहाँअज़ान से नमाज़ तक का फ़क़त इक सफ़र हैबाक़ी सफ़र यूँही बेकार तय करता हैइंसान यहाँ
दूर नौबत हुई फिरने लगे बे-ज़ार क़दमज़र्द फ़ाक़ों के सताए हुए पहरे वालेअहल-ए-ज़िंदाँ के ग़ज़बनाक ख़रोशाँ नालेजिन की बाहोँ में फिरा करते हैं बाहें डाले
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
दुनिया के लिए तोहफ़ा-ए-नायाब है औरतअफ़्साना-ए-हस्ती का हसीं बाब है औरतदेखा था जो आदम ने वही ख़्वाब है औरतबे-मिस्ल है आईना-ए-आदाब है औरतक़ाएम उसी औरत से मोहब्बत की फ़ज़ा हैऔरत की अता असल में एहसान-ए-ख़ुदा हैहै माँ तो दिल-ओ-जाँ से लुटाती है सदा प्यारममता के लिए फिरती है दौलत सर-ए-बाज़ारआसान बनाती है दुआ से रह-ए-दुश्वारअपने ग़म-ओ-आलाम का करती नहीं इज़हारक़दमों में लिए रहती है जन्नत का ख़ज़ानाऔरत के तसव्वुर में है ता'मीर-ए-ज़मानाबीवी है तो ग़म-ख़्वार है पैकर है वफ़ा काआँचल को बना लेती है फ़ानूस हया कारुख़ देख के रखती है क़दम अपना हवा कागिरवीदा बनाती है तबस्सुम की अदा काख़्वाब-ए-निगह-ए-इश्क़ की ता'बीर है औरतमर्दों के लिए हुस्न की ज़ंजीर है औरतहै शक्ल में बेटी की बहार-ए-सहर-ओ-शामक़ुदरत का अतिया है ये क़ुदरत का है इनआ'मदेती है मसर्रत का दिल-ए-ज़ार को पैग़ामहै रूह को तस्कीन जिगर का है ये आरामदुख़्तर है तो अनमोल गुहर कहते हैं उस कोअल्लाह की रहमत का समर कहते हैं इस कोसूरत में बहन की है चमन का ये हसीं फूलईसार-ओ-मोहब्बत है शब-ओ-रोज़ का मा'मूलबे-कार की रंजिश को कभी देती नहीं तूलएहसास-ए-मुरव्वत में रहा करती है मशग़ूललिखी है हर इक रंग में औरत की कहानीकहते हैं उसे अज़्मत-ए-इंसाँ की निशानीमरियम है तो पाकीज़ा-ओ-शफ़्फ़ाफ़ हैं आ'मालबन जाए ज़ुलेख़ा तो हया को करे पामालगर है क्लियोपैट्रा तो सियासत की चले चाललैला है तो करती है ये दीवाना-ओ-बद-हालढल जाना हर इक रूप में आसान है उस कोबदले हुए हालात की पहचान है उस को'हिंदा' है तो सालारी का दिखलाती है जौहरहै 'राबिया-बसरी' तो ये वलियों की है हम-सरबैठी है अगर हुस्न का बाज़ार सजा करग़ैरत को बनाती है असीर-ए-हवस-ए-ज़रवाक़िफ़ है बहर-तौर ये जीने के हुनर सेबे-ख़ौफ़ गुज़र जाती है हर राहगुज़र सेइक पल में ये शो'ला है तो इक पल में है शबनमया'नी है कभी गुल तो कभी ख़ार-ए-मुजस्समहो सब्र पे आमादा तो सह जाए हर इक ग़महो जाए मुख़ालिफ़ तो पलट दे सफ़-ए-आलमपाबंद-ए-वफ़ा हो तो दिल-ओ-जान लुटा देआ जाए बग़ावत पे तो दुनिया को हिला दे
ग़ायत-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ सूरत-ए-आगाज़-ओ-मआलवही बे-सूद-ए-तजस्सुस वही बेकार सवालमुज़्महिल साअत-ए-इमरोज़ की बे-रंगी सेयाद-ए-माज़ी से ग़मीं दहशत-ए-फ़र्दा से निढालतिश्ना अफ़्कार जो तस्कीन नहीं पाते हैंसोख़्ता अश्क जो आँखों में नहीं आते हैंइक कड़ा दर्द कि जो गीत में ढलता ही नहींदिल के तारीक शिगाफ़ों से निकलता ही नहींऔर उलझी हुई मौहूम सी दरबाँ की तलाशदश्त ओ ज़िंदाँ की हवस चाक-ए-गिरेबाँ की तलाश
दिल ये कहता है कहीं और चले जाएँ जहाँकोई दरवाज़ा अबस वा हो, न बे-कार कोईयाद फ़रियाद का कश्कोल लिए बैठी होमहरम-ए-हसरत-ए-दीदार हो दीवार कोईन कोई साया-ए-गुल हिजरत-ए-गुल से वीराँ
मैं ने हर चंद ग़म-ए-इश्क़ को खोना चाहाग़म-ए-उल्फ़त ग़म-ए-दुनिया में समोना चाहावही अफ़्साने मिरी सम्त रवाँ हैं अब तकवही शोले मिरे सीने में निहाँ हैं अब तकवही ब-सूद ख़लिश है मिरे सीने में हनूज़वही बेकार तमन्नाएँ जवाँ हैं अब तकवही गेसू मिरी रातों पे हैं बिखरे बिखरेवही आँखें मिरी जानिब निगराँ हैं अब तककसरत-ए-ग़म भी मिरे ग़म का मुदावा न हुईमेरे बेचैन ख़यालों को सुकून मिल न सकादिल ने दुनिया के हर इक दर्द को अपना तो लियामुज़्महिल रूह को अंदाज़-ए-जुनूँ मिल न सकामेरी तख़य्युल का शीराज़-ए-बरहम है वहीमेरे बुझते हुए एहसास का आलम है वहीवही बे-जान इरादे वही बे-रंग सवालवही बे-रूह कशाकश वही बेचैन ख़यालआह इस कश्मकश सुब्ह ओ मसा का अंजाममैं भी नाकाम मिरी सई अमल भी नाकाम
अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूँ तो चलूँअपने ग़म-ख़ाने में इक धूम मचा लूँ तो चलूँऔर इक जाम-ए-मय-ए-तल्ख़ चढ़ा लूँ तो चलूँअभी चलता हूँ ज़रा ख़ुद को सँभालूँ तो चलूँजाने कब पी थी अभी तक है मय-ए-ग़म का ख़ुमारधुँदला धुँदला नज़र आता है जहान-ए-बेदारआँधियाँ चलती हैं दुनिया हुई जाती है ग़ुबारआँख तो मल लूँ ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँवो मिरा सेहर वो एजाज़ कहाँ है लानामेरी खोई हुई आवाज़ कहाँ है लानामिरा टूटा हुआ वो साज़ कहाँ है लानाइक ज़रा गीत भी इस साज़ पे गा लूँ तो चलूँमैं थका हारा था इतने में जो आए बादलकिसी मतवाले ने चुपके से बढ़ा दी बोतलउफ़ वो रंगीन पुर-असरार ख़यालों के महलऐसे दो चार महल और बना लूँ तो चलूँमुझ से कुछ कहने को आई है मिरे दिल की जलनक्या किया मैं ने ज़माने में नहीं जिस का चलनआँसुओ तुम ने तो बेकार भिगोया दामनअपने भीगे हुए दामन को सुखा लूँ तो चलूँमेरी आँखों में अभी तक है मोहब्बत का ग़ुरूरमेरे होंटों को अभी तक है सदाक़त का ग़ुरूरमेरे माथे पे अभी तक है शराफ़त का ग़ुरूरऐसे वहमों से ज़रा ख़ुद को निकालूँ तो चलूँ
सीम-गूँ हाथों से ऐ जान ज़राखोल मय-रंग जुनूँ-ख़ेज़ आँखेंउसी मीनार को देखसुब्ह के नूर से शादाब सहीउसी मीनार के साए तले कुछ याद भी हैअपने बेकार ख़ुदा की मानिंदऊँघता है किसी तारीक निहाँ-ख़ाने मेंएक अफ़्लास का मारा हुआ मुल्ला-ए-हज़ींएक इफ़रीत उदासतीन सौ साल की ज़िल्लत का निशाँऐसी ज़िल्लत के नहीं जिस का मुदावा कोई
ज़ाहिर की मोहब्बत से मुरव्वत से गुज़र जाबातिन की अदावत से कुदूरत से गुज़र जाबे-कार दिल-अफ़गार क़यादत से गुज़र जाइस दौर की बोसीदा सियासत से गुज़र जा
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