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नज़्म
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ग़ुर्बत है वही अफ़्लास वही रोना है वही बेकारी का
मेहनत की अभी तक क़द्र नहीं मेहनत का अभी तक मोल नहीं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
चाँद भी एक फफूँदी लगी रोटी की तरह सर पे टंगा रहता है
कैसे काटे कोई बीमारी में बेकारी के दिन?
गुलज़ार
नज़्म
फाइलें घर में पड़ी हैं और दफ़्तर में है घर
शग़्ल-ए-बेकारी बहुत है वक़्त बेहद मुख़्तसर
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
शेर की ख़ाला बिल्ली उस को क्या क्या सबक़ पढाती है
खम्बा नोचने लगती है बेचारी जब खिसियाती है
जमील उस्मान
नज़्म
अभी तो तितलियाँ मैले परों से दर-ब-दर फिरती हैं बे-चारी
अभी तो चाँद भी ठंडक नहीं देता मोहब्बत की