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नज़्म
उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनिया में
सहमी हुई दो-शीज़ाओं की मुस्कान भी बेची जाती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बेची लाज भी अपने हुनर की इस आबाद ख़राबे में
देखो हम ने कैसे बसर की आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था
जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
कि मैं ने फ़ास्टस की तरह अपनी रूह बेची थी
मसर्रत की मुसलसल गर्दिश-ए-यकसाँ से उक्ता कर
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
जहान-ए-इश्क़ में कुछ बेश-ओ-कम का फ़र्क़ न था
तिरी निगाह में दैर-ओ-हरम का फ़र्क़ न था
दर्शन सिंह
नज़्म
ये साकिनान-ए-फ़लक दर्द-ओ-ग़म को क्या जानें
ये ख़ाकियों के रह-ए-बेश-ओ-कम को क्या जानें
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
कौन सी ऐसी हैं ख़िदमात तिरी बेश-बहा
ख़ूँ-बहा क्यूँ लब-ओ-दंदान-ए-हसीनाँ से लिया