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नज़्म
द्वारका-धीश कहीं बन के मुकुट सर पे रखा
काली कमली रही जंगल में सर-ए-दोश कहीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
हर जल्वा जहाँगीर था जिस वक़्त जवाँ थी
कहते हैं जिसे नूर-जहाँ नूर-ए-जहाँ थी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
आपस की फूट से हो क्यूँ दिल-फ़िगार दोनों
हाँ छोड़ दो ये रंजिश बन जाओ यार दोनों
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
चलो मथुरा सखी देखें रंगीले श्याम की झाँकी
ये अपने नाम का मोहन है अपने नाम की झाँकी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
मदरसा आग़ोश-ए-मादर से कोई बेहतर नहीं
सच है माँ के पाओं के नीचे है फ़िरदौस-ए-बरीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
है सज्दा-गाह-ए-मलाइक मक़ाम-ए-आज़ादी
कि बाम-ए-‘अर्श से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की