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नज़्म
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
अख़्तर शीरानी
नज़्म
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की
हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुल-रू रंग-भरे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जब चौदहवीं शब का चाँद निकल कर दहर मुनव्वर करता है
जब कोई मोहब्बत का मारा कुछ ठंडी साँसें भरता है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
आज-कल भूले हुए हैं सब इलेक्शन और डिबेट
प्रैक्टीकल की कापियों के आज-कल भरते हैं पेट
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
दिलों में अज़दहाम-ए-आरज़ू लब बंद रहते थे
नज़र से गुफ़्तुगू होती थी दम उल्फ़त का भरते थे