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नज़्म
तुम भी पहले बच्चे ही थे ये मत भूलो अब्बू जी
नटखट भी मुझ जैसे ही थे ये मत भूलो अब्बू जी
हैदर बयाबानी
नज़्म
करो याद उन बुज़ुर्गों को शराफ़त जिन पे है नाज़ाँ
न भूलो उन को भी जो थे सिपह-सालार-ए-शरबाज़ाँ
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुम्हारी अर्जुमंद अम्मी को मैं भूला बहुत दिन में
मैं उन की रंग की तस्कीन से निमटा बहुत दिन में
जौन एलिया
नज़्म
ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद हैं हम तू और हमें नाशाद न कर
अख़्तर शीरानी
नज़्म
फिर देखे हैं वो हिज्र के तपते हुए दिन भी
जब फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ में फ़ुग़ाँ भूल गई है