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नज़्म
फिर भी तू अगर अपनी ज़ुल्फ़ें मेरे शानों पर बिखराए
काँटों से भरी मेरी दुनिया फूलों की जन्नत हो जाए
सलाम संदेलवी
नज़्म
या खुली ज़ुल्फ़ को बिखराए हुए रात के वक़्त
रक़्स-फ़रमा है किसी जन्नत-ए-शादाब की हूर
फ़रीद इशरती
नज़्म
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़