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नज़्म
ख़ालिद मुबश्शिर
नज़्म
मेहर-ए-ताबाँ ने दो-आलम में उजाला कर दिया
आदमी ने आदमी का बोल-बाला कर दिया
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
जिस ने ख़ुलूस-ए-दिल से ऐ 'कैफ़' सब को पाला
जिस का हर एक घर में अब भी है बोल-बाला
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
जहाँ में सब से ऊँचा इक मोहब्बत का शिवाला है
जहाँ देखो जिधर देखो उसी का बोल-बाला है
सुमन ढींगरा दुग्गल
नज़्म
दुनिया की इल्ला-बिल्ला ठसी पड़ी है मुझ में
हाँ कुछ काम की चीज़ें भी हैं इस कबाड़-ख़ाने में