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नज़्म
फ़रेब-ए-बे-ख़ुदी देते हुए बिल्लोर के साग़र
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सर-बर-आवुर्दा सनोबर की घनी शाख़ों में
चाँद बिल्लोर की टूटी हुई चूड़ी की तरह अटका है
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
कि जिस की लौ, अगरचे वो न शर्क़ी थी न ग़र्बी थी
मगर दो नैन के बिल्लोर में कुछ यूँ भड़कती थी
बिलाल अहमद
नज़्म
ज़फ़र सय्यद
नज़्म
एक शोख़ी-भरी दोशीज़ा-ए-बिल्लोर-जमाल
जिस के होंटों पे है कलियों के तबस्सुम का निखार
ज़िया जालंधरी
नज़्म
कुछ ऐसे ओढ़ रखी थी फ़ज़ा ने नूर की चादर
गुमाँ होता था जिस पर ये कि है बिल्लोर की चादर