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नज़्म
ये क्या मुमकिन नहीं तू आ के ख़ुद अब इस का दरमाँ कर
फ़ज़ा-ए-दहर में कुछ बरहमी महसूस होती है
कँवल एम ए
नज़्म
गुबार-ए-रहगुज़ार-ए-दहर में आलूदगी कब तक
मिरे ज़र्रीं तसव्वुर को बिसात-ए-कहकशाँ दे दे
मोहम्मद सादिक़ ज़िया
नज़्म
बिसात-ए-ज़ेहन-ओ-दिल को चाहता हूँ पाक कर लूँ
ज़र-ओ-इम्लाक की ख़्वाहिश से अपने आप को आज़ाद कर लूँ
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
खेत तेरे रश्क-ए-गुलशन दश्त तेरे लाला-ज़ार
तुझ को बख़्शी है मशिय्यत ने बिसात-ए-ज़र-निगार
शातिर हकीमी
नज़्म
कूचा-ए-बिंत-ए-सरा-ए-दहर में चलिए कभी सर-सलामत आइए
और इक रक़्स-ए-फ़ना तामील दर्स-ए-बे-ख़ुदी