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नज़्म
सोचता हूँ ये तिरा रक़्स ये सुर-ताल का रंग
शोख़ी-ए-हुस्न भी है 'इश्क़ का ए'जाज़ भी है
बिसमिल आज़मी
नज़्म
निगाह-ए-‘इश्क़ में ये इम्तियाज़ कैसा है
गुलों की बज़्म में ख़ारों को चूम ले उठ कर
बिसमिल देहलवी
नज़्म
सूरत-ए-तस्वीर चुप 'बिस्मिल' हुए ये बोल कर
हुस्न की दुनिया है देखो दीदा-ए-दिल खोल कर
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
मगर क्या कीजिए जब फ़ैसला ये है मशिय्यत का
कि मैं फ़ितरत की आँखों से गिरूँ अश्क-ए-रवाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
'बिस्मिल'-ओ-'बेदी'-ओ-'महरूम'-ओ-'वफ़ा'-ओ-'गुलज़ार'
मजमा'-ए-शा'इर-ओ-साहिब-नज़राँ याद आया
कामिल चाँदपुरी
नज़्म
वहाँ परियाँ मोहब्बत के ख़ुदा के गीत गाती हैं
कनार-ए-आब-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ बाहम सैर करते हैं
नज़ीर मिर्ज़ा बर्लास
नज़्म
देखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद
'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़'