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नज़्म
और दिन के बहलावे में रात बिताई जाती है
इस मौसम पानी आगे आएगा तुम घर में मत सोना
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
चाँद की भीगी भीगी किरनों के साथ बिताई थी
मैं ने अपने अश्कों का रुख़ मोड़ दिया था
सुबोध लाल साक़ी
नज़्म
सीने के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बताई जाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुम्हारी आप-बीती भी अभी तक ना-मुकम्मल है
इसे तो नाक़िदान-ए-फ़न ने सुनते ही सराहा है