aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bitaane"
इक ज़रा सोचने दोइस ख़याबाँ मेंजो इस लहज़ा बयाबाँ भी नहींकौन सी शाख़ में फूल आए थे सब से पहलेकौन बे-रंग हुई रंज-ओ-तअब से पहलेऔर अब से पहलेकिस घड़ी कौन से मौसम में यहाँख़ून का क़हत पड़ागुल की शह-रग पे कड़ावक़्त पड़ासोचने दोसोचने दोइक ज़रा सोचने दोये भरा शहर जो अब वादी-ए-वीराँ भी नहींइस में किस वक़्त कहाँआग लगी थी पहलेइस के सफ़-बस्ता दरीचों में से किस में अव्वलज़ह हुई सुर्ख़ शुआओं की कमाँकिस जगह जोत जगी थी पहलेसोचने दोहम से उस देस का तुम नाम ओ निशाँ पूछते होजिस की तारीख़ न जुग़राफ़िया अब याद आएऔर याद आए तो महबू-ए-गुज़िश्ता याद आएरू-ब-रू आने से जी घबराएहाँ मगर जैसे कोईऐसे महबूब या महबूबा का दिल रखने कोआ निकलता है कभी रात बिताने के लिएहम अब उस उम्र को आ पहुँचे हैं जब हम भी यूँहीदिल से मिल आते हैं बस रस्म निभाने के लिएदिल की क्या पूछते होसोचने दो
इतवार की दोपहर तो हमेशा ही अच्छी होती हैबिल्कुल तुम्हारी तरहबे-फ़िक्र बे-परवाह आज़ादमैं ने भी हमेशा इसे अपने ही तरीक़े से बिताया हैपर जाने क्यूँकुछ अर्से से जब भी ये सुकून भरा वक़्त अपने साथ बिताने की कोशिश कीतुम दूर-दराज़ के वक़्तों से निकल के चुप-चाप मेरे क़रीब बैठ जाते होमेरे हाथों की खुली किताब बंद कर केअपने ही क़िस्से सुनाने लगते होदिसम्बर की सर्दीबारिश की बूँदेऔर इतवार की दोपहरवही क़िस्सा जो तुम ने जिया था कभीमेरे साथलग-भग हर हफ़्ते दोहराते होऔर मुझे एहसास भी नहीं होता कि मैं क़ैद हूँकुछ आज़ाद से लम्हों में हमेशा के लिए
उस की हँसी मुझे चुभ रही थीउँगलियाँ वो मुझे दिखी रही थीमैं देख नहीं सकती थीपर अन-देखी कैसे करतीमैं ने ख़्वाब बुने थेकुछ लम्हे चुने थेउन के साथ बिताने कोउन्हें अपना बनाने कोक्यूँकिये वो राजकुमार थाजो मुझे पाने को बे-क़रार थामुझ से प्यार बहुत करता थामुझे खोने से भी डरता थाइस लिए तोमेरी इज़्ज़त को तार-तार कियामुझे तोड़ दिया मुझे मार दिया
मेरी महबूब मिरी राह में काँटे हैं बहुततेरे पैरों के लिए कोई सितम ठीक न थाचार पल साथ जो गुज़रे हैं वही काफ़ी हैउम्र-भर साथ बिताने का भरम ठीक न था
कल रात कहानी परियों कीबाजी ने सुनाई चुपके सेफिर धीरे धीरे हवा चलीऔर निन्दिया आई चुपके सेहल्के थे कहीं गहरे थे कहींरंगों की वो बारिश देखी थीथीं जिस में बहुत सी तस्वीरेंहम ने वो नुमाइश देखी थीफिर सब से छुपा के हम ने भीतस्वीर बनाई चुपके सेफ़ुर्सत जो मिली तो हम यूँ हीकुछ वक़्त बिताने बैठे थेगर्मी के दिनों में ढोलक परइक गीत सुनाने बैठे थेमग़रिब की तरफ़ से इतने मेंबदली भी घिर आई चुपके से
यहाँ तक हम आ गए हैंऔर हाँ तुम्हारा पता इन्हीं लोगों से मालूम हुआ जो मर चुके थेजब हम चले थे तो आधी उम्र बिताने के पछतावे के सामने दिन डूब रहा थाएक घोड़ा खड़ा थाऔर हाँप रहा थाएक मिनट ठहरो मैं थोड़ी सी चाय पी लूँ तो आगे बढ़ूँमेरे हाथ में ये जो सफ़ेद काग़ज़ है इसे तुम्हारी हिमाक़त नहीं छीन सकतीऔर न हवा उड़ा सकती हैअगर तुम तैरना जानते हो तो ज़िंदगी बहुत बुरी होते हुए भी बहुत बुरी नहींतुम बिना थके हुए भी कई साल तक तैर सकते होअगर तुम्हारे दिल में एक याद भी बाक़ी हैतो जुगनुओं से भरे हुए जंगल इस दुनिया में अब भी हैंएक जुगनू कहीं से पकड़ लोऔर उसे अपनी जेब में रख लोऔर अँधेरे में चलोरौशनी तुम्हारी जेब से छन-छन के रास्ता समझाएगीमगर सुनोजब रास्ता मिल जाए तो जुगनू को छोड़ देनाआज़ाद कर देना
अभी मत छेड़ना मुझ कोअभी हर ज़ख़्म कारी हैअभी उस की जुदाई की फ़क़त अजरक उतारी हैअभी सदमे उठाने हैंकई लम्हे मोहब्बत के अज़िय्यत में बिताने हैंमिरे हर ज़ख़्म को हमदम अभी नासूर होना हैबड़ी लम्बी मसाफ़त हैथकन से चूर होना हैअभी पलकों को चूमेंगे तुम्हारी याद के जुगनूतुम्हारे क़ुर्ब की ख़ुशबू तुम्हारी बात का जादूअभी कुछ भी नहीं बिगड़ाअभी कुछ भी नहीं बदलाअभी तो साँस की लय पर हर इक ख़्वाहिश मचलती हैअभी तो मौसम-ए-हिज्राँ गुमाँ की इब्तिदा में हैअभी बंद-ए-क़बा में हैअभी तो ना-तमामी का समुंदर पार करना हैअभी ख़ुद से उलझना हैअभी ख़ुद से मुकरना हैअभी हमराह रखना है ख़सारा सारे जीवन काशजर दिल में उगाना हैज़ियाँ के ज़र्द सावन का
किसी नीली नदी के सुर्ख़ होते पानियों के इक किनारे परतुम्हारी और अपनी आँखों में घुलती हुई इक शाम का मंज़र सजाना हैहवा के नर्म-रौ झोंके के लहजे मेंशफ़क़ के सुरमई होते हुए लफ़्ज़ों में तुम से बात करनी हैज़रूरी तो नहीं वो लफ़्ज़ मोहताज-ए-बयाँ भी होंज़रूरी तो नहीं ये भी कि तुम मौजूद हो उस पलतुम्हारा होना बस मेरे तसव्वुर में ज़रूरी हैकहीं पानी में अपने 'अक्स यूँ चलते दिखाई देंकि जैसे नीले थालों में दिए जलते दिखाई देंदिए ऐसे कि जिन की रौशनी में चाँद तारे ढूँडें अपनेदाएरों के बे-निशाँ रस्तेतो जब रात अपने गेसू खोल कर शानों पे फैला लेतुम्हारी ज़ौ-फ़िशानी हीशब-ए-तारीक में मुझ को सरासीमा न होने देतुम्हारी आँखों में लौ देते जुगनू मेरे बातिन कोज़िया-ओ-नूर से भर देंबस ऐसे में तुम्हारे साथ कुछ लम्हे बिताने हैंतुम्हारी रौशन आँखों के ग़ज़ल जैसे तकल्लुम परमुझे इक नज़्म कहनी हैकई ख़्वाबों की सतरें जो अधूरी हैंकहीं ख़्वाहिश का बनता टूटता इक पुर-असर मिसरा'मुकम्मल सब को करना हैमगर ये याद रखना हैतुम्हारे हिज्र के लम्हों को सदियों की तड़ख़ती उँगलियों के ज़ख़्मी पोरों पर भी गिनना हैकई बे-सम्त रस्तों से किसी मंज़िल को जाना हैकिसी दुख को ख़ुद अपनी ही ख़ुशी से कम बताना हैफिर उस पर मुस्कुराना हैउसी दो-जज़्बी लम्हे मेंतुम्हारी और अपनी आँखों के ख़्वाबों पे इक दीवार सी ता'मीर करनी हैलकीर इक खींचनी है जोजुदा कर दे हमारे रास्ते लेकिनहमारी एक मंज़िल हो
उतर कर रूह की गहराइयों मेंरौशनी भरने से पहले हीझटक कर हम जिन्हेंफिर लौट आते हैंइसी बे-मेहर हंगामों की दुनिया मेंजहाँ हर पल अधूरा हैजहाँ हर साथ साया हैअँधेरे इस नगर मेंअन-गिनत सदियाँ बिताने मेंकभी मिल जाएँ कुछ लम्हेतो मुट्ठी भींच कर अपनीचमकते जुगनुओं की रौशनी जैसे ये पलअपनी हथेली परसजा लेना
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने मेंज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना होउसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंमदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना होबहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंबदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना होकिसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंकिसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना होहक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना होहमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
किसी के दूर जाने सेतअ'ल्लुक़ टूट जाने सेकिसी के मान जाने सेकिसी के रूठ जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को आज़माने सेकिसी के आज़माने सेकिसी को याद रखने सेकिसी को भूल जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को छोड़ देने सेकिसी के छोड़ जाने सेना शम्अ' को जलाने सेना शम्अ' को बुझाने सेमुझे अब डर नहीं लगताअकेले मुस्कुराने सेकभी आँसू बहाने सेना इस सारे ज़माने सेहक़ीक़त से फ़साने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी की ना-रसाई सेकिसी की पारसाई सेकिसी की बेवफ़ाई सेकिसी दुख इंतिहाई सेमुझे अब डर नहीं लगताना तो इस पार रहने सेना तो उस पार रहने सेना अपनी ज़िंदगानी सेना इक दिन मौत आने सेमुझे अब डर नहीं लगता
फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढे हम ने बहाने होंफ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सच-मुच के मय-ख़ाने हों
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भीमगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल औरमहके हुए रुकएकिताबें माँगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थेउन का क्या होगावो शायद अब नहीं होंगे!
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
उस नार में ऐसा रूप न था जिस रूप से दिन की धूप दबेइस शहर में क्या क्या गोरी है महताब-रुख़े गुलनार-लबेकुछ बात थी उस की बातों में कुछ भेद थे उस की चितवन मेंवही भेद कि जोत जगाते हैं किसी चाहने वाले के मन मेंउसे अपना बनाने की धुन में हुआ आप ही आप से बेगानाइस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये दौर अपने बराहीम की तलाश में हैसनम-कदा है जहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहकिया है तू ने मता-ए-ग़ुरूर का सौदाफ़रेब-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये माल-ओ-दौलत-ए-दुनिया ये रिश्ता ओ पैवंदबुतान-ए-वहम-ओ-गुमाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहख़िरद हुई है ज़मान ओ मकाँ की ज़ुन्नारीन है ज़माँ न मकाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये नग़्मा फ़स्ल-ए-गुल-ओ-लाला का नहीं पाबंदबहार हो कि ख़िज़ाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहअगरचे बुत हैं जमाअत की आस्तीनों मेंमुझे है हुक्म-ए-अज़ाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
आज के नामऔरआज के ग़म के नामआज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ाज़र्द पत्तों का बनज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस हैदर्द की अंजुमन जो मिरा देस हैक्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नामकिर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नामपोस्ट-मैनों के नामताँगे वालों का नामरेल-बानों के नामकार-ख़ानों के भूके जियालों के नामबादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़दहक़ाँ के नामजिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गएजिस की बेटी को डाकू उठा ले गएहाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली हैदूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली हैजिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तलेधज्जियाँ हो गई हैउन दुखी माओं के नामरात में जिन के बच्चे बिलकते हैं औरनींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहींदुख बताते नहींमिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
तुम मिरे पास रहोमिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहोजिस घड़ी रात चले,आसमानों का लहू पी के सियह रात चलेमरहम-ए-मुश्क लिए, नश्तर-ए-अल्मास लिएबैन करती हुई हँसती हुई, गाती निकलेदर्द के कासनी पाज़ेब बजाती निकलेजिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिलआस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगेआस लिएऔर बच्चों के बिलकने की तरह क़ुलक़ुल-ए-मयबहर-ए-ना-सूदगी मचले तो मनाए न मनेजब कोई बात बनाए न बनेजब न कोई बात चलेजिस घड़ी रात चलेजिस घड़ी मातमी सुनसान सियह रात चलेपास रहोमिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहो
वो उम्र बिताए साल हुएअब अपनी दीद के रस्ते में
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