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नज़्म
आ निकलता है कभी रात बिताने के लिए
हम अब उस उम्र को आ पहुँचे हैं जब हम भी यूँही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कई लम्हे मोहब्बत के अज़िय्यत में बिताने हैं
मिरे हर ज़ख़्म को हमदम अभी नासूर होना है
नाहीद अज़्मी
नज़्म
बस ऐसे में तुम्हारे साथ कुछ लम्हे बिताने हैं
तुम्हारी रौशन आँखों के ग़ज़ल जैसे तकल्लुम पर
अंफ़ाल रफ़ीक़
नज़्म
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
बुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जा
न तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानी