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नज़्म
वो हवा में सैकड़ों जंगी दुहल बजते हुए
वो बिगुल की जाँ-फ़ज़ाँ आवाज़ लहराती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
आ, और बिगुल का नग़्मा-ए-''जाँ-आफ़रीं'' भी सुन
आ, बे-कसों का नाला-ए-अंदोह-गीं भी सुन
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
किस तरफ़ जाऊँ कहाँ धोऊँ मैं अपना दामन
मेरे मक़्तूल मिरे साथ हैं बे-ग़ुस्ल-ओ-कफ़्न
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा फिर भी तन्हा रहा
तिश्नगी-ए-मशाम उस को बाद-ए-सबा की तरह गुल-ब-गुल ले गई
वहीद अख़्तर
नज़्म
हमारे दिन-रात उसी वजूद-ओ-अदम के इक वक़फ़ा-ए-मुसलसल में
हस्ती-ओ-नीस्ती के बर्ज़ख़ में पा-ब-गुल हैं
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
बयाज़-ए-दिल को जो खोलें तो जुस्तुजू होगी
हर एक सफ़्हा-ए-हस्ती की गुफ़्तुगू होगी