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नज़्म
ज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ
ख़ुद आँख से हम ने देखी है बातिल की शिकस्त-ए-फ़ाश यहाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
चलो यूँ करो मिरे वास्ते कि बुलंद-ओ-बाला इमारतों का लो जाएज़ा
जो फ़लक को बोसा लगा रही हों इमारतें,
आरिफ़ इशतियाक़
नज़्म
ज़बानों के रस में ये कैसी महक है
ये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू
फ़हमीदा रियाज़
नज़्म
कि हम मेहराब-ए-अबरू में सितारे टाँकने वाले
दर-ए-लब बोसा-ए-इज़हार की दस्तक से अक्सर खोलने वाले