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नज़्म
हमारी किश्त-ए-बे-माया हैं इस सहरा में क्या बोया
बगूलों के सिवा कुछ गर्म झोंकों के सिवा हम ने
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
ऐसा तो कोई पैदा न हुआ जो तुम को रिहाई दे आ कर
तुम ख़्वाबों से मसरूर हुए जो बोया था वो काटोगे
असलम फ़र्रुख़ी
नज़्म
उस दिन पिछले बरस में हम ने क्या बोया था क्या पाया था
क्या पाने से क्या खोया था
इमरान शमशाद नरमी
नज़्म
और जिस के पँख की उड़ान गाँव की हद तक थी
तब खेतों में ज़हर नहीं बोया जाता था