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नज़्म
ब्रेक लगाने में ही आफ़ियत है
क्यूँकि मद्द-ए-मुक़ाबिल को अपनी रफ़्तार पर क़ाबू नहीं अगरचे
शमीम अल्वी
नज़्म
हर आन दिलों विच याँ अपने जो ध्यान गुरु का धरते हैं
और सेवक हो कर उन के ही हर सूरत बीच कहाते हैं