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नज़्म
हर वक़्त मगर पढ़ते रहना कम-उम्रों का तो काम नहीं
सब अपनी अपनी कुर्सी पर सुध-बुध बिसराए बैठे हैं
शौकत परदेसी
नज़्म
हुस्न जब अफ़्सुर्दा फूलों की तरह पामाल था
जब मोहब्बत का ग़लत दुनिया में इस्ति'माल था
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
इक जनाज़े को उठाए जा रहे थे चंद लोग
तुम ने पूछा क्या हुआ क्यूँ जा रहे हो तुम मलूल
मयकश अकबराबादी
नज़्म
मुसलमान और हिन्दू जैन बुध सिख और ईसाई
मिरी कोशिश से उस दिन सब के सब हो जाएँगे भाई
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
नज़्म
बुध के टूटे-फूटे बुत के सर पर बूढ़ा कर्गस
मुर्दों की मज्लिस में बैठा अपनी बिपता सुना रहा है
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
उन ख़ुदा-आगाह दरवेशों की सूरत रक़्स करता है
जिन्हें ख़ुद अपने तन-मन की कोई सुध-बुध नहीं रहती