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नज़्म
कौन पोंछेगा मिरे बहते हुए अश्कों की धार
कौन पानी पढ़ के देगा होगा जब मुझ को बुख़ार
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
यही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का
बग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार
आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कभी अफ़सर को थोड़ा सा बुख़ार आ जाए तो छुट्टी
कभी ससुराल से बेगम का तार आ जाए तो छुट्टी
खालिद इरफ़ान
नज़्म
ख़ुदा के फ़ज़्ल से जिस दिन बुख़ार आता है टीचर को
तो उस दिन अपना मकतब भी बहुत आबाद होता है
मुश्ताक़ अहमद नूरी
नज़्म
कौन से क़िस्से होंगे जो ख़ाली पेट हँसी निकलती होगी
बुख़ार में आराम के लिए कौन से बहाने धरते होंगे