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नज़्म
ये सरगोशियाँ कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को बुलाते बुलाते मिरे
दिल पे गहरी थकन छा रही है
मीराजी
नज़्म
वही सूरज है लेकिन और ही कुछ जगमगाहट है
न जाने कैसे कैसे फूल अब मुझ को बुलाते हैं
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
जिसे सब उर्मिला कह कर बुलाते थे
जो अपने बाप के सीने से लग कर वक़्त-ए-रुख़्सत ख़ूब रोई
त्रिपुरारि
नज़्म
उसी मालिक को फिर हलवे की दावत पर बुलाते हैं
वो हलवा ख़ूब खाते हैं उसे भी कुछ खिलाते हैं
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मगर तुम को तो शायद नित-नए मौसम बुलाते थे
नए सुर और नए गीतों के संगम गुनगुनाते थे
शाइस्ता मुफ़्ती
नज़्म
छुपा लेती हूँ चेहरा उस घड़ी मैं लाज के मारे
मुझे जब सेज पर अपनी बुलाते हैं मिरे साजन
ओवेस अहमद दौराँ
नज़्म
मुझे अब चला है पता कि मोहब्बत न कमज़ोर थी आप की शैख़ साहब
बुलावे पे नासिर के यूँ चल दिए आप उठ कर
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
किस से प्यारे की दिलाते हैं ये मुझ को याद अब
और मुझे अपना समझ कर मैं बुलाते सब के सब
अमीर औरंगाबादी
नज़्म
छप रही है मसनवी-ए-'मीर' भी बा-ख़त्त-ए-'मीर'
अब जदीद उर्दू अदब का हो रहा है इंतिज़ाम