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नज़्म
दवामिय्यत के जल्वे छा रहे हैं बाग़-ए-बुस्ताँ पर
गुज़र मुमकिन नहीं है मौत का जिन के नज़ारों में
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म में बहारें छुपी हुई
इक कारवान-ए-निकहत-ए-बुसताँ लिए हुए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जवानी इक गुल-ए-मख़्सूस है बुस्तान-ए-'आलम का
इसी गुलशन में आ कर इम्तिहाँ होता है आदम का
रज़ी बदायुनी
नज़्म
हमेशा से बपा इक जंग है हम उस में क़ाएम हैं
हमारी जंग ख़ैर ओ शर के बिस्तर की है ज़ाईदा
जौन एलिया
नज़्म
बुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जा
न तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क्या थाल कटोरी चाँदी की क्या पीतल की ढिबिया-ढकनी
क्या बर्तन सोने चाँदी के क्या मिट्टी की हंडिया चीनी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सरवरी ज़ेबा फ़क़त उस ज़ात-ए-बे-हम्ता को है
हुक्मराँ है इक वही बाक़ी बुतान-ए-आज़री