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नज़्म
नागाह लहकते खेतों से टापों की सदाएँ आने लगीं
बारूद की बोझल बू ले कर पच्छिम से हवाएँ आने लगीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आ आ के हज़ारों बार यहाँ ख़ुद आग भी हम ने लगाई है
फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमीं ने बुझाई है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मैं बहुत सरकश हूँ लेकिन इक तुम्हारे वास्ते
दिल बुझा सकता हूँ मैं आँखें बचा सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
होंट हँसते हों दिखावे के तबस्सुम के लिए
दिल ग़म-ए-ज़ीस्त से बोझल रहे आज़ुर्दा रहे