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नज़्म
यही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़ह
यहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूस
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ख़्वाब थे इक दिन औज-ए-ज़मीं से काहकशाँ को छू लेंगे
खेलेंगे गुल-रंग शफ़क़ से क़ौस-ए-क़ुज़ह में झूलेंगे
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
चाँदनी, क़ौस-ए-क़ुज़ह, औरत, शगूफ़ा, लाला-ज़ार
इल्म का इन नर्म शानों पर कोई रखता है बार?
जोश मलीहाबादी
नज़्म
रास्तों से ख़्वाब-गाहों तक मुसलसल मौज-ए-रंग
जिस तरह क़ौस-ए-क़ुज़ह की टूटती अंगड़ाइयाँ
अहमद फ़राज़
नज़्म
ख़ालिद मुबश्शिर
नज़्म
क़ौस-ए-क़ुज़ह को भी शर्मिंदा कर देती थीं
लेकिन अब मौसम बदलते ही न जाने वो तितलियाँ
रियाज़ तौहीदी
नज़्म
मिरी आँखों में घुल जाती है वो कैफ़-ए-नज़र बन कर
मुझे क़ौस-ए-क़ुज़ह की छाँव में पहरों सुलाती है