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नज़्म
फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे
तो उन की राखियों को देख ऐ जाँ चाव के मारे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अब इस महीने में पहुँची है याँ तलक ये चाल
फ़लक का जामा पहन सुर्ख़ी-ए-शफ़क़ से लाल