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नज़्म
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
अख़्तर शीरानी
नज़्म
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जब रात का बढ़ता है सन्नाटा चैन से दुनिया सोती है
तब आँख मिरी खुल जाती है और दिल की रग रग रोती है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
ऐ कराची ये बता अब किस से मिलने आऊँगी
किस की बाँहों में सिमट कर चैन ओ सुख मैं पाऊँगी