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नज़्म
क्या बधिया भैंसा बैल शुतुर क्या गौनें पल्ला सर-भारा
क्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ और अँगारा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे
सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें
जौन एलिया
नज़्म
''सितारा-बार ओ मह-चकाँ ओ ख़ुर-फ़िशाँ'' जमाल-ए-यार
जहान-ए-नूर कारवाँ-ब-कारवाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
अब अहरमन के हाथ में है तेग़-ए-ख़ूँ-चकाँ
ख़ुश है कि दस्त-ओ-बाज़ू-ए-यज़्दाँ चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फ़ज़ा में शोला-अफ़्शाँ देव-ए-इस्तिब्दाद का ख़ंजर
सियासत की सनानें अहल-ए-ज़र के ख़ूँ-चकाँ तेवर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जो और को डाले चक्कर में फिर वो भी चक्कर खाता है
जो और को ठोकर मार चले फिर वो भी ठोकर खाता है