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नज़्म
तारिक़ क़मर
नज़्म
आस का दीप जला कर दिल में छोड़ गया मुझ को हरजाई
वो तो एक छलावा था बस मैं बद-क़िस्मत बूझ न पाई
सदा अम्बालवी
नज़्म
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मैं अपने आप में हारा हूँ और ख़्वाराना हारा हूँ
जिगर-चाकाना हारा हूँ दिल-अफ़गाराना हारा हूँ