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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
चंचल मुस्काती मुस्काती गोरी का मुखड़ा महताब
पतझड़ के पेड़ों में अटका पीला सा इक पत्ता चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इक गर्म अँगीठी जलती हो और शम्अ हो रौशन और तिस पर
वो दिलबर, शोख़, परी, चंचल, है धूम मची जिस की घर घर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हर मौज-ए-रवाँ पर लहराती हँसती सी रुपहली इक धारी
जैसे किसी चंचल के तन पर लहराए बनारस की सारी
नज़ीर बनारसी
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तो मुझ को हम-नशीं अपना लड़कपन याद आता है
हुआ करती है जब छुट्टी तो चंचल सर-फिरे ख़ुद-सर
शमीम करहानी
नज़्म
वो देखो वो मुस्काता बल खाता ले कर अंगड़ाई
इक बादल की ओट से निकला चंचल शोख़ सजीला चाँद