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नज़्म
और 'कृष्ण-चंद्र' 'मंटो' ज़िंदा कहानियाँ हैं
लफ़्ज़ों के आइने में हुस्न-ए-बयाँ का जादू
फ़रहत एहसास
नज़्म
हैं जसोधा के लिए ज़ीनत-ए-आग़ोश कहीं
गोपियों के भी तसव्वुर से हैं रू-पोश कहीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
हर जल्वा जहाँगीर था जिस वक़्त जवाँ थी
कहते हैं जिसे नूर-जहाँ नूर-ए-जहाँ थी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
यकसाँ हैं जब क़रीने रफ़्तार के चलन के
दोनों हो चाँद-सूरज इस गर्दिश-ए-कुहन के
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
आज वो दिन है कि जिस दिन के लिए थे ख़ूँ बहे
चंद्र-शेखर और भगत-सिंह और फिर गाँधी के ख़ून
ख़याल अंसारी
नज़्म
चलो मथुरा सखी देखें रंगीले श्याम की झाँकी
ये अपने नाम का मोहन है अपने नाम की झाँकी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
मदरसा आग़ोश-ए-मादर से कोई बेहतर नहीं
सच है माँ के पाओं के नीचे है फ़िरदौस-ए-बरीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
है सज्दा-गाह-ए-मलाइक मक़ाम-ए-आज़ादी
कि बाम-ए-‘अर्श से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी