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नज़्म
चप्पा चप्पा पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक
दफ़्न होगा न कहीं इतना ख़ज़ाना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
अपने सर से चादर खींच के अपना जिस्म छपा लेती है
उस पागल लड़की ने जाने कितने बोझ उठा रक्खे हैं
आतिफ़ तौक़ीर
नज़्म
बहता था जिस ज़मीं में इल्म-ओ-हुनर का दरिया
क़ौमों ने बारी बारी छापा है जिस पे मारा
अहमद अज़ीमाबादी
नज़्म
चप्पा-चप्पा घूम कर आने की हसरत है तो है
दोस्तो मिर्रीख़ पे जाने की हसरत है तो है
अताउर्रहमान तारिक़
नज़्म
घुप रंगों के घाट उतरती रीछ की ये अधली सरसाई
दिल की उजली बे सर्व सामानी इस में क्या क्या ठाट छपा है
सलाहुद्दीन परवेज़
नज़्म
चप्पा-चप्पा घूम कर आने की हसरत है तो है
दोस्तो मिर्रीख़ पर जाने की हसरत है तो है