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नज़्म
तू ने दिल चीर के ज़र्रों का दरूँ भी देखा
तेरी नज़रों में था सूरज भी चराग़-ए-रह-ए-बाद
शुजा फ़र्रुख़ी
नज़्म
वो देखो हो रही है रौशनी ऐवान-ए-दौलत में
लहू दहक़ाँ का जलता है चराग़-ए-बज़्म-ए-'इशरत में
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
ग़रीबों के मोहल्लों में चराग़-ए-रह-गुज़र बन कर
अंधेरे झोंपड़ों को भीक अपनी दे रहा होता
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
हर एक क़ुमक़ुमा यहाँ चराग़-ए-कोह-ए-तूर है
हर इक फ़ज़ा पे रंग है हर एक सम्त नूर है
अर्श मलसियानी
नज़्म
फुर्क़त-ए-दर्द में बे-आब हुआ तख़्ता-ए-दाग़
किस से कहिए कि भरे रंग से ज़ख़्मों के अयाग़