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नज़्म
अली अकबर नातिक़
नज़्म
उस का छुपना था कि आँखों में मिरी कुछ न रहा
सुरमई सब्ज़ मुनव्वर रम-ए-आहू के सिवा
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
सुलैमाँ सर-ब-ज़ानू तुर्श-रू ग़म-गीं, परेशाँ-मू
जहाँ-गिरी, जहाँ-बानी फ़क़त तर्रार-ए-आहू
नून मीम राशिद
नज़्म
नर्गिस-ए-अरज़क के शैदा दीदा-ए-आहू भी देख
ऐ सुनहरी ज़ुल्फ़ के क़ैदी सियह गेसू भी देख
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ऐ गिरफ़्तार-ए-अबु-बकर-ओ-अली हुशियार-बाश
'इश्क़ को फ़रियाद लाज़िम थी सो वो भी हो चुकी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं