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नज़्म
असर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुल
नवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
ये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल कर
सहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओ
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
दुर्द-ए-यक-साग़र-ए-ग़फ़लत है चे दुनिया ओ चे-दीं
जिस्म के दाग़ छुपाना तो कोई बात नहीं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
तमाम नज़रें खजूर की गुठलियों में इंज़ाल ढूँडती थीं
वो छे महीने हमल उठाए हमारे घर की क़दीम ज़ीनत
आदिल मंसूरी
नज़्म
दो बूँद भी पानी बरसा तो हो जाएगा फ़ौरन रेनी डे
हफ़्ते में तो कम से कम छे दिन इतवार मनाएँगे हम सब
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त
फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''