aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "che"
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
राम बन-बास से जब लौट के घर में आएयाद जंगल बहुत आया जो नगर में आएरक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगाछे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगाइतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आएजगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँप्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँमोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आएधर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौनघर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौनघर जलाने को मिरा लोग जो घर में आएशाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजरतुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थरहै मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आएपाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थेकि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बेपाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठेराम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठेराजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझेछे दिसम्बर को मिला दूसरा बन-बास मुझे
ऐसी यख़-बस्ता ताबीरों के हर दिन से अच्छी हैं और सच्ची भी हैंजिस में धुँदला चक्कर खाता चमकीला-पन छे अतराफ़ का रोग बना है
छोटी सी बिल्लूछोटा सा बस्ताठूँसा है जिस मेंकाग़ज़ का दस्तालकड़ी का घोड़ारुई का भालूचूरन की शीशीआलू कचालूबिल्लू का बस्ताजिन की पिटारीजब इस को देखोपहले से भारीलट्टू भी इस मेंरस्सी भी इस मेंडंडा भी इस मेंगिल्ली भी इस मेंऐ प्यारी बिल्लूये तो बताओक्या काम करनेइस्कूल जाओउर्दू न जानोइंग्लिश न जानोकहती हो ख़ुद कोबिल्क़ीस बानोउम्र की इतनीकच्ची नहीं होछे साल की होबच्ची नहीं होबाहर निकालोलकड़ी का घोड़ाये लट्टू रस्सीये गिल्ली डंडागुड़िया के जूतेजंपर जुराबेंबस्ते में रक्खोअपनी किताबेंमुँह न बनाओइस्कूल जाओऐ प्यारी बिल्लूऐ प्यारी बिल्लू
चंद बद-ज़ेब से शोहरत-ज़दा इंसाँ अक्सरअपनी दौलत ओ सख़ावत की नुमाइश के लिएया कभी रहम के जज़्बे से हरारत पा करचार छे पैसे उन्हें बख़्श दिया करते हैं
चला धीमे धीमे से कछवे की चालपहुँचते पहुँचते उसे ग़ार तक शाम होने लगीउसे देख कर शेर भन्ना गयाछटंकी बराबर ये ख़ुराक भेजी है जंगल नेऔर इस क़दर देर सेमिटा दूँगा ख़रगोश की ज़ात कोमैं जंगल का जंगल ही खा जाऊँगासुना और ख़रगोश रोने लगागिड़गिड़ाने लगाहुज़ूर इस में मेरी नहीं है ख़तान जंगल सभा का कोई दोष हैकि जंगल ने तो सात ख़रगोश भेजे मगरमगर क्यामगर सरमगर क्या क्यूँ हकला रहे हो बताओ मुझेमगर मगर मगर सरकहाँ हैं तुम्हारे छे ग़द्दार साथीवो ख़रगोश फिर से सिसकने लगाहमें रास्ते में हुज़ूर एकज़ालिम ने रोका थाऔर बहुत गालियाँ आप को दींकहा मैं दोहराऊँ कैसे वो सब कुछ हुज़ूरकहा जाओ कह दो मिरे साथियों को वही खा गयाये सुनना था कि शेर ग़ुर्राया मोंछों में बल आ गएअकड़ने लगी उस की हंटरी पूँछऔर आँखों में बस ख़ून उतरने लगाकहाँ है किधर है बता कौन हैमिरे होते किस का हुआ हौसलाकि मेरी रेआ'या पे कोई ज़ुल्म कर सके
एक दिन हज़रत-ए-फ़ारूक़ ने मिम्बर पे कहाक्या तुम्हें हुक्म जो कुछ दूँ तो करोगे मंज़ूरएक ने उठ के कहा ये कि न मानेंगे कभीकि तिरे अदल में हम को नज़र आता है फ़ुतूरचादरें माल-ए-ग़नीमत में जो अब के आईंसेहन-ए-मस्जिद में वो तक़्सीम हुईं सब के हुज़ूरउन में हर एक के हिस्से में फ़क़त इक आईथा तुम्हारा भी वही हक़ कि यही है दस्तूरअब जो ये जिस्म पे तेरे नज़र आता है लिबासये उसी लूट की चादर से बना होगा ज़रूरमुख़्तसर थी वो रिदा और तिरा क़द है दराज़एक चादर में तिरा जिस्म न होगा मस्तूरअपने हिस्से से ज़ियादा जो लिया तू ने तो अबतू ख़िलाफ़त के न क़ाबिल है न हम हैं मामूरगरचे वो हद-ए-मुनासिब से बढ़ा जाता थासब के सब मोहर-ब-लब थे चे इनास ओ चे ज़कूररोक दे कोई किसी को ये न रखता था मजालनश्शा-ए-अदल-ओ-मसावात से सब थे मख़मूरअपने फ़रज़ंद से फ़ारूक़-ए-मोअज़्ज़म ने कहातुम को है हालत-ए-असली की हक़ीक़त पे उबूरतुम्हीं दे सकते हो इस का मिरी जानिब से जवाबकि न पकड़े मुझे महशर में मिरा रब्ब-ए-ग़फ़ूरबोले ये इब्न-ए-उम्र सब से मुख़ातिब हो करइस में कुछ वालिद-ए-माजिद का नहीं जुर्म ओ क़ुसूरएक चादर में जो पूरा न हुआ उन का लिबासकर सकी इस को गवारा न मिरी तब-ए-ग़यूरअपने हिस्से की भी मैं ने उन्हें चादर दे दीवाक़िआ की ये हक़ीक़त है कि जो थी मस्तूरनुक्ता-चीं ने ये कहा उठ के कि हाँ ऐ फ़ारूक़हुक्म दे हम को कि अब हम उसे मानेंगे ज़रूर
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारीज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारीयही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन काबग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारीबनाता है यही इंसान को कामिल-तरीन इंसाँसिखाता है यही अख़्लाक़ ओ ईसार ओ रवा-दारीयही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत परयही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारीइसी के नाम का चलता है सिक्का सारे आलम मेंइसी के सर पे रहता है हमेशा ताज-ए-सरदारीइसी के सब करिश्मे ये नज़र आते हैं दुनिया मेंइसी के दम से रौनक़ आलम-ए-इम्काँ की है सारीये ला-सिलकी, ये टेलीफ़ोन ये रेलें, ये तय्यारेये ज़ेर-ए-आब ओ बाला-ए-फ़लक इंसाँ की तर्रारीहुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़मकि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारीसमुंदर हो गए पायाब सहरा बिन गए गुलशनकिया साइंस ने भी ए'तराफ़-ए-इज्ज़-ओ-नाचारीबुख़ार ओ बर्क़ का जर्रार लश्कर है अब आमादाउगलवा ले ज़मीन ओ आसमाँ की दौलतें सारीग़रज़ चारों तरफ़ अब इल्म ही की बादशाही हैकि उस के बाज़ूओं में क़ुव्वत-ए-दस्त-ए-इलाही हैनिगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानीतो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानीवही क़ौमें तरक़्क़ी के मदारिज पर हैं फाएक़-तरकि है जिन में तमद्दुन और सियासत की फ़रावानीइसी के ज़ोम में है जर्मनी चर्ख़-ए-तफ़ाख़ुर परइसी के ज़ोर पर मिर्रीख़ का हम-सर है जापानीइसी की क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है मग़रूर अमरीकाइसी के बिल पर लड़की हो रही है रुस्तम-ए-सानीइशारे पर इसी के नक़्ल-ओ-हरकत है सब इटली कीइसी के ताबा-ए-फ़रमान हैं रूसी ओ ईरानीइसी के जुम्बिश-ए-अबरू पे है इंग्लैण्ड का ग़र्राइसी के हैं सब आवुर्दे फ़्रांसीसी ओ एल्बानीकोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदान ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानीबग़ैर इस के जो रहना चाहते हैं इस ज़माने मेंसमझ रक्खें फ़ना उन के लिए है हुक्म-ए-रब्बानीज़माना फेंक देगा ख़ुद उन्हें क़अ'र-ए-हलाकत मेंवो अपने हाथ से होंगे ख़ुद अपनी क़ब्र के बानीज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होनाज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होनातरक़्क़ी की खुली हैं शाहराहें दहर में हर सूनज़र आता है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से जहाँ ममलूचले जाते हैं उड़ते शहसवारान-ए-फ़लक-पैमाख़िराज-ए-तहनियत लेते हुए करते हुए जादूगुज़रते जा रहे हैं दूसरों को छोड़ते पीछेकभी होता है सहरा मुस्तक़र उन का कभी टापूकमर बाँधे हुए दिन रात चलने पर हैं आमादादिमाग़ अफ़्कार से और दिल वुफ़ूर-ए-शौक़ से मलूलअलग रह कर ख़याल-ए-ज़हमत ओ एहसास-ए-राहत सेलगे हैं अपनी अपनी फ़िक्र में बा-ख़ातिर-ए-यकसूमगर हम हैं कि असलन हिस नहीं हम को कोई इस कीहमारे पा-ए-हिम्मत इन मराहिल में हैं बे-क़ाबूजहाँ पहला क़दम रक्खा था रोज़-ए-अव्वलीं हम नेनहीं सरके इस अपने असली मरकज़ से ब-क़द्र-ए-मूये हालत है कि हम पर बंद है हर एक दरवाज़ानज़र आता नहीं हरगिज़ कोई उम्मीद का पहलूमगर वा-हसरता फिर भी हम अपने ज़ोम-ए-बातिल मेंसमझते हैं ज़माने भर से आगे ख़ुद को मंज़िल मेंज़रूरत है कि हम में रौशनी हो इल्म की पैदानज़र आए हमें भी ताकि अस्ल-ए-हालत-ए-दुनियाहमें मालूम हो हालात अब क्या हैं ज़माने केहमारे साथ का जो क़ाफ़िला था वो कहाँ पहुँचाजो पस्ती में थे अब वो जल्वा-गर हैं बाम-ए-रिफ़अत परजो बालक बे-निशाँ थे आज है इन का अलम बरपाहमारी ख़ूबियाँ सब दूसरों ने छीन लीं हम सेज़माने ने हमें इतना झिंझोड़ा कर दिया नंगारवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दीख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दाये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमीबने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्साअगर हो जाएँ राग़िब अब भी हम तालीम की जानिबतो कर सकते हैं अब भी मुल्क में हम ज़िंदगी पैदाबहुत कुछ वक़्त हम ने खो दिया है लेकिन इस पर भीअगर चाहें तो कर दें पेश-रौ को अपने हम पसपानिकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिनरगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरताकोई मख़्फ़ी हरारत गर हमारे दिल को गरमा देहमारे जिस्म में फिर ज़िंदगी की रूह दौड़ा देवतन वालो बहुत ग़ाफ़िल रहे अब होश में आओउठो बे-दार हो अक़्ल-ओ-ख़िरद को काम में लाओतुम्हारे क़ौम के बच्चों में है तालीम का फ़ुक़्दाँये गुत्थी सख़्त पेचीदा है इस को जल्द सुलझाओयही बच्चे बिल-आख़िर तुम सभों के जा-नशीं होंगेतुम अपने सामने जैसा उन्हें चाहो बना जाओबहुत ही रंज-दह हो जाएगी उस वक़्त की ग़फ़लतकहीं ऐसा न हो मौक़ा निकल जाने पे पछताओये है कार-ए-अहम दो चार इस को कर नहीं सकतेख़ुदा-रा तुम भी अपने फ़र्ज़ का एहसास फ़रमाओये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल करसहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओजो ज़ी-एहसास हैं हासिल करो तुम ख़िदमतें उन कीजो ज़ी-परवा हैं उन को जिस तरह हो उस तरफ़ लाओग़रज़ जैसे भी हो जिस शक्ल से भी हो ये लाज़िम हैतुम अपने क़ौम के बच्चों को अब तालीम दिलवाओअगर तुम मुस्तइ'द्दी को बना लोगे शिआर अपनायक़ीं जानो कि मुस्तक़बिल है बेहद शानदार अपनाख़ुदावंदा! दुआओं में हमारी हो असर पैदाशब-ए-ग़फ़लत हमारी फिर करे नूर-ए-सहर पैदाहमारे सारे ख़्वाबीदा क़वा बे-दार हो जाएँसर-ए-नौ हो फिर इन में ज़िंदगी की कर्र-ओ-फ़र्र पैदाहमें एहसास हो हम कौन थे और आज हम क्या हैंकरें माहौल-ए-मुल्की के लिए गहरी नज़र पैदामिला रक्खा है अपने जौहर-ए-कामिल को मिट्टी मेंहम अब भी ख़ाक से कर सकते हैं लाल-ओ-गुहर पैदाअगर चाहें तो हम मुश्किल वतन की दम में हल कर देंहज़ारों सूरतें कर सकते हैं हम कारगर पैदाब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिनअगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदावतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे मेंजहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदाहम इस मंज़िल के आख़िर पर पहुँच कर बिल-यक़ीं दम लेंअगर कुछ ताज़ा-दम हो जाएँ अपने हम-सफ़र पैदाजो कोशिश मुत्तहिद हो कर कहीं इक बार हो जाएयक़ीं है मुल्क की क़िस्मत का बेड़ा पार हो जाए
अलिफ़ जो आलू खाएगावो मोटा हो जाएगाबे बारिश जब आती हैकोयल शोर मचाती हैपे पाली मैं ने बिल्लीचल दी छोड़ के वो दिल्लीते तितली है ज़िंदा फूलजो न माने ना-माक़ूलटे टट्टू पर चढ़ भय्याडर मत आगे बढ़ भय्यासे साबित है ये लट्टूचुन्नू जा ले आ पट्टूजीम मैं जूते खाऊँगारो कर चुप हो जाऊँगाचे चुन्नू है इक लड़कानन्हा मुन्ना छोटा साहे वो हा तू आया हैहींग और पट्टू लाया हैख़े ख़च्चर मैं लाऊँगाअपने घर में नचाऊँगादाल न दाल पका अम्मीबर्फ़ी मुझे खिला अम्मीडाल डरूँ मैं भालू सेमैं नहीं डरता ख़ालू सेरे रोना मुझे आता हैजब मिरा भय्या गाता हैसीन सरौता ला अम्मीमुझ को पान खिला अम्मीबस भाई आगे मत जाइत्ती बस नज़्म न होगा
हर पयम्बर पे हँसा है ये ज़माना लेकिनहर पयम्बर ने झुकाई है ज़माने की जबींअपने हम-अस्र से ख़ाइफ़ न हो ऐ वक़्त की आँचइस की मिट्टी में सितारों का धुआँ है कि नहींइसी मिट्टी से दमकती है ये धरती वर्नादुर्द-ए-यक-साग़र-ए-ग़फ़लत है चे दुनिया ओ चे-दीं
अब्बा तो चले गए हैं दफ़्तरअम्मी को बुख़ार आ रहा हैछम्मन तो गया हुआ है बाज़ारजुम्मन खाना पका रहा हैज़ैबुन को उसी का ताज़ा बच्चापक्का गाना सुना रहा हैअमजद सोफ़े पर कोएले सेकाला तोता बना रहा हैअसलम दादी की ले के तस्वीरउस की मूँछें उगा रहा हैतौक़ीर ब्लेड के कमालातक़ालीन पे आज़मा रहा हैछे सात तिपाईयाँ मिला करअकबर गाड़ी चला रहा हैतसनीम बनी हुई है घोड़ाजो मेज़ पे भागा जा रहा है'अख़्तर' पर्दे की झालरों सेबिल्ली को दुल्हन बना रहा हैनन्हा इक़बाल लेटे लेटेनदी नाले बहा रहा हैसुनते हैं कि अनक़रीब इन काएक और भी भाई आ रहा है
क़स्र-ए-शाही में कि मुमकिन नहीं ग़ैरों का गुज़रएक दिन नूर-जहाँ बाम पे थी जल्वा-फ़िगनकोई शामत-ज़दा रहगीर उधर आ निकलागरचे थी क़स्र में हर चार तरफ़ से क़दग़नग़ैरत-ए-हुस्न से बेगम ने तमंचा माराख़ाक पर ढेर था इक कुश्ता-ए-बे-गोर-ओ-कफ़नसाथ ही शाह-ए-जहाँगीर को पहुँची जो ख़बरग़ैज़ से आ गई अबरू-ए-अदालत पे शिकनहुक्म भेजा कि कनीज़ान-ए-शबिस्तान-ए-शाहीजा के पूछ आएँ कि सच या कि ग़लत है ये सुख़ननख़वा-ए-हुस्न से बेगम ने ब-सद-नाज़ कहामेरी जानिब से करो अर्ज़ ब-आईन-ए-हसनहाँ मुझे वाक़िआ-ए-क़त्ल से इंकार नहींमुझ से नामूस-ए-हया ने ये कहा था कि बज़नउस की गुस्ताख़-निगाही ने किया उस को हलाककिश्वर-ए-हुस्न में जारी है यही शर-ए-कुहनमुफ़्ती-ए-दीं से जहाँगीर ने फ़तवा पूछाकि शरीअत में किसी को नहीं कुछ जा-ए-सुख़नमुफ़्ती-ए-दीन ने बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर साफ़ कहाशरअ कहती है कि क़ातिल की उड़ा दो गर्दनलोग दरबार में इस हुक्म से थर्रा उट्ठेपर जहाँगीर के अबरू पे न बल था न शिकनतरकाशों को ये दिया हुक्म कि अंदर जा करपहले बेगम को करें बस्ता-ए-ज़ंजीर-ओ-रसनफिर उसी तरह उसे खींच के बाहर लाएँऔर जल्लाद को दें हुक्म कि हाँ तेग़ बज़नये वही नूर-जहाँ है कि हक़ीक़त में यहीथी जहाँगीर के पर्दे में शहंशाह-ए-ज़मनउस की पेशानी-ए-नाज़ुक पे जो पड़ती थी गिरहजा के बन जाती थी औराक़-ए-हुकूमत पे शिकनअब न वो नूर-जहाँ है न वो अंदाज़-ए-ग़ुरूरन वो ग़म्ज़े हैं न वो अर्बदा-ए-सब्र-शिकनअब वही पाँव हर इक गाम पे थर्राते हैंजिन की रफ़्तार से पामाल थे मुर्ग़ान-ए-चमनएक मुजरिम है कि जिस का कोई हामी न शफ़ीएएक बेकस है कि जिस का न कोई घर न वतनख़िदमत-ए-शाह में बेगम ने ये भेजा पैग़ामख़ूँ-बहा भी तो शरीअत में इक अम्र-ए-अहसानमुफ़्ती-ए-सहारा से फिर शाह ने फ़तवा पूछाबोले जाएज़ है रज़ा-मंद हूँ गर बच्चा ओ ज़नवारिसों को जो दिए लाख दिरम बेगम नेसब ने दरबार में की अर्ज़ कि ऐ शाह-ए-ज़मनहम को मक़्तूल का लेना नहीं मंज़ूर क़िसासक़त्ल का हुक्म जो रुक जाए तो है मुस्तसनहो चुका जब कि शहंशाह को पूरा ये यक़ीनकि नहीं इस में कोई शाएबा-ए-हीला-ओ-फ़नउठ के दरबार से आहिस्ता चला सू-ए-हरमथी जहाँ नूर-जहाँ मो'तकिफ़-ए-बैत-ए-ख़ज़नदफ़अतन पाँव पे बेगम के गिरा और ये कहातू अगर कुश्ता शुदी आह चे मी कर्दम मन
बिस्तर में लेटे लेटेउस ने सोचा''मैं मोटा होता जाता हूँकल मैं अपने नीले सूट कोऑल्टर करनेदर्ज़ी के हाँ दे आऊँगानया सूट दो-चार महीने बाद सही!दर्ज़ी की दूकान से लग करजो होटल हैउस होटल कीमछली टेस्टी होती हैकल खाऊँगालेकिन मछली की बू सालीहाथों में बस जाती हैकल साबुन भी लाना हैघर आतेलेता आऊँगाअब के ''यार्डली'' लाऊँगाऑफ़िस में कल काम बहुत हैबॉस अगर नाराज़ हुआ तोदो दिन की छुट्टी ले लूँगाऔर अगर मूड हुआ तोछे के शो में''राम-और-श्याम'' भी देख आऊँ गापिक्चर अच्छी है सालीनौ से बाराकलब रमीदो दिन से लक अच्छा हैकल भी साठ रूपे जीता थाआज भी तीस रूपे जीता हूँऔर उम्मीद हैकल भी जीत के आऊँगाबस अब नींद आए तो अच्छाकल भीजीत केनींद आए तोइक्का-दुक्की नहला-दहलाईंट की बेगममछली की बूताश के पत्तेजोकर जोकरसूट पहन करमोटा-तगड़ा जोकर....इतना बहुत सा सोच के वोसोया था मगरफिर न उठा!!दूसरे दिन जबउस का जनाज़ादर्ज़ी की दूकान के पास से गुज़रा तोहोटल से मछली की बूदूर दूर तक आई थी!!!
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतबता'लीम न होगी जिस में कभी सब आज़ादी से घूमेंगेउस्ताद पढ़ेंगे दर्जों में हम लोग ख़ुशी से घूमेंगेइस्कूल न जा कर बाग़ों में तफ़रीह करेंगे बे-मतलबहम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतबपढ़ने के लिए बच्चों को जहाँ मुर्ग़ा न बनाया जाएगाचाँटे न जमाए जाएँगे डंडों से न पीटा जाएगाउस्ताद के मौला-बख़्श जहाँ दिखला न सकेंगे कुछ कर्तबहम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतबजो याद करेगा ख़ूब सबक़ ता-उम्र न होगा पास वहीजो खेल में लेगा दिलचस्पी पढ़ने में न होगा फ़ेल कभीदर-अस्ल हमारे मकतब का होगा हर इक दस्तूर अजबहम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतबजिस दिन भी पड़ा बीमार कोई इस्कूल में होगा हॉलीडेदो बूँद भी पानी बरसा तो हो जाएगा फ़ौरन रेनी डेहफ़्ते में तो कम से कम छे दिन इतवार मनाएँगे हम सबहम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतबखेलेंगे कभी जब हम क्रिकेट तो ख़ूब उड़ाएँगे छक्केहॉकी में दिखाएँगे वो हुनर रह जाएँगे सब हक्के-बक्केहर टीम से मैचें जीतेगा हम लोगों का फूटबाल क्लबहम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
सीमा ने मुझ से पूछाऐ मेरे प्यारे चचाये रोज़ आप मुझ कोदेते थे कैसा गच्चाकहते थे कर रहा हूँवा'दा मैं तुम से सच्चाजंगल के पेड़ पर सेबंदर का एक बच्चालाऊँगा तोड़ कर मैंलेकिन अभी है कच्चासमझे थे आप है येबुद्धू सी एक बच्चीछे साल की है होगीकुछ अक़्ल की भी कच्चीलेकिन समझ गई हूँमैं सारी गच्चा गच्चीबिल्कुल बुरा न मानेंमैं बात कह दूँ सच्चीबस हो गई है चचाअब आप की भी कच्चीमुझ को बता चुकी हैंकल रात मेरी चच्चीउगते नहीं शजर परयूँ बंदरों के बच्चेहोते नहीं वो हरगिज़हरगिज़ भी पक्के कच्चेमैं आप के तो वा'देमानूँ कभी न सच्चेमत दीजिए आप मुझ कोअब ऐसे वैसे ग़च्चेचच्ची ने ख़ुद हैं देखेबंदर के अंडे बच्चेबंदरिया अंडे दे देजब घोंसलों के अंदरबनते हैं पहले चूज़ेफिर प्यारे प्यारे बंदर
''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्तफ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''
वो एक लम्हाजो सर पटकता है पत्थरों परपड़ा हुआ है जो शाम के फैलते धुवें में लहू में लत-पतवो एक लम्हाकि जिस की ख़ातिर हज़ारों सदियाँ करोड़ों बरसों से आबला-पामगर वो लम्हासफ़र की पीली उदासियों के कबूतरों के परों से उलझासवाद-ए-मंज़िल की मिशअलों मेंपिघल पिघल कर अयाँ हुआ हैवो एक लम्हासुलगते शब्दों की उँगलियों से गिरा जो नीचेतो धँस गया फिर अटल मआनी की दलदलों मेंमगर ये अच्छा हुआ कि उस दमखजूर भर कर जहाज़ आएतमाम नज़रें खजूर की गुठलियों में इंज़ाल ढूँडती थींवो छे महीने हमल उठाए हमारे घर की क़दीम ज़ीनतन सीढ़ियों परन खिड़कियों मेंन चाय की प्यालियों से उठते धुवें के पीछेतमन्ना काग़ज़ पे फैल जाए तो उस की शिद्दत का नाम टूटेसफ़ेद बकरी की आँख से कौन झाँकता हैतुम्हें ख़बर हैतुम्हें ख़बर हो तो मुझ से कह दोमैं अपने वालिद की क़ब्र का रास्ता तलाशूँइधर भी सूरज में सारा मंज़र लहू लहू हैउधर भी सायों में सारी आँखें धुआँ धुआँ हैंये बंद आँखों में कौन छुप करबदन के अंदर को झाँकता हैख़मोशियों के खंडर में गूँजीख़मोशियों के खंडर में गूँजी अज़ाँ फ़जर कीवज़ू के पानी के साथ सारे गुनाह टपकेदुआ में उस ने शराब माँगी तोतिश्नगी के सराब छलकेसितारे नीचे उतर के आएवो एक लम्हाशिकस्तगी के बदन के अंदरवो एक लम्हाशिकस्तगी के बदन से बाहरवो एक लम्हा हज़ार सदियों के बंधनों से निकल कर आयावो एक लम्हा जो दस्तरस के वसीअ हल्क़ों से दूर रह कररुतूबतों में बड़ी तमाज़त से मुस्कुरायामुक़द्दरों में हज़ार लम्हों के दरमियाँ जिस का तख़्त ख़ालीलहू में लत-पत वो एक लम्हावो एक लम्हा जो सर पटकता है पत्थरों पर!
अब कहीं कोई नहींजल गए सारे फ़रिश्तों के बदनबुझ गए नील-गगनटूटता चाँद बिखरता सूरजकोई नेकी न बदीअब कहीं कोई नहींआग के शोले बढ़ेआसमानों का ख़ुदाडर के ज़मीं पर उतराचार छे गाम चला टूट गयाआदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले करफिर गुफाओं की तरफ़ लौट गयाअब कहीं कोई नहीं
नज़र उठाओ सफ़ीर-ए-लैला बुरे तमाशों का शहर देखोये मेरा क़र्या ये वहशतों का अमीन क़र्यातुम्हें दिखाऊँये सेहन-ए-मस्जिद था याँ पे आयत-फ़रोश बैठे दुआएँ ख़िल्क़त को बेचते थेयहाँ अदालत थी और क़ाज़ी अमान देते थे रहज़नों कोऔर इस जगह पर वो ख़ान-क़ाहें थीं आब ओ आतिश की मंडियाँ थींजहाँ पे अमरद-परस्त बैठे सफ़ा-ए-दिल की नमाज़ें पढ़ करख़याल-ए-दुनिया से जाँ हटातेसफ़ीर-ए-लैला मैं क्या बताऊँ कि अब तो सदियाँ गुज़र चुकी हैंमगर सुनो ऐ ग़रीब-ए-साया कि तुम शरीफ़ों के राज़-दाँ होयही वो दिन थे मैं भूल जाऊँ तो मुझ पे लानतयही वो दिन थे सफ़ीर-ए-लैला हमारी बस्ती में छे तरफ़ से फ़रेब उतरेदरों से आगे घरों के बीचों फिर उस से चूल्हों की हाँडियों मेंजवान-ओ-पीर-ओ-ज़नान-ए-क़र्या ख़ुशी से रक़्साँतमाम रक़्साँहुजूम-ए-तिफ़्लाँ था या तमाशे थे बोज़्नों केकि कोई दीवार-ओ-दर न छोड़ावो उन पे चढ़ कर शरीफ़ चेहरों की गर्दनों को फलाँगते थेदराज़-क़ामत लहीम बौनेरज़ा-ए-बाहम से कोल्हुओं में जुते हुए थेख़रासते थे वो ज़र्द ग़ल्ला तो उस के पिसने से ख़ून बहता था पत्थरों सेमगर न आँखें कि देख पाईं न उन की नाकें कि सूँघते वोफ़क़त वो बैलों की चक्कियाँ थीं सरों से ख़ालीफ़रेब खाते थे ख़ून पीते थे और नींदें थीं बज्जुओं कीसफ़ीर-ए-लैला ये दास्ताँ है इसी खंडर कीइसी खंडर के तमाश-बीनों फ़रेब-ख़ुर्दों की दास्ताँ हैमगर सुनो अजनबी शनासाकभी न कहना कि मैं ने क़रनों के फ़ासलों को नहीं समेटाफ़सील-ए-क़र्या के सर पे फेंकी गई कमंदें नहीं उतारींतुम्हें दिखाऊँ तबाह बस्ती के एक जानिब बुलंद टीलाबुलंद टीले पे बैठे बैठे हवन्नक़ों-साकभी तो रोता था अपनी आँखों पे हाथ रख कर कभी मुसलसल मैं ऊँघता थामैं ऊँघता था कि साँस ले लूँमगर वो चूल्हों पे हाँडियों में फ़रेब पकतेसियाह साँपों की ऐसी काया-कलप हुई थी कि मेरी आँखों पे जम गए थेसो याँ पे बैठा मैं आने वाले धुएँ की तल्ख़ी बता रहा थाख़बर के आँसू बहा रहा थामगर मैं तन्हा सफ़ीर-ए-लैलाफ़क़त ख़यालों की बादशाही मिरी विरासततमाम क़र्ये का एक शाइर तमाम क़र्ये का इक लईं थायही सबब है सफ़ीर-ए-लैला मैं याँ से निकला तो कैसे घुटनों के बल उठा थानसीब-ए-हिजरत को देखता थासफ़र की सख़्ती को जानता थाये सब्ज़ क़रियों से सदियों पीछे की मंज़िलों का सफ़र था मुझ कोजो गर्द-ए-सहरा में लिपटे ख़ारों की तेज़ नोकों पे जल्द करना था औरवो ऐसा सफ़र नहीं था जहाँ पे साए का रिज़्क़ होताजहाँ हवाओं का लम्स मिलताफ़रिश्ते आवाज़-ए-अल-अमाँ में मिरे लिए हीअजल की रहमत को माँगते थेयही वो लम्हे थे जब शफ़क़ के तवील टीलों पे चलते चलतेमैं दिल के ज़ख़्मों को साथ ले करसफ़र के पर्बत से पार उतरा
इब्तिदा से कभी नज़्म होती नहींऔर कभी इब्तिदा से भी पहले कहींनज़्म होने के आसार मिलते हैंजैसे कहीं क़ब्ल अज़ ज़िंदगीज़िंदगी के तसव्वुर से पहलेमगर ज़िंदगी से भी बेहतरबरामद हुई कोई तहज़ीबतहज़ीब मिलती तो हैपर कभी इब्तिदा उस की मिलती नहींइब्तिदा से भी पहलेतलक ज़ेहन जाता नहींऔर तहज़ीब से लेना-देना भी क्यानज़्म की इब्तिदा नून सेनून लेगी नहींये हुरूफ़-ए-तहज्जी का इक रुक्न हैजीम से जिस्मचे से चमकडाल से डालडासीन से सीन ऊपर के तीनवाव से वहमजो किस क़दर अहम हैनज़्म के वस्त मेंजो कि होता नहींदायरा तो नहींट्राइ-एँगल नहींहीगज़ा-गोनल नहींख़त नहीं वेव हैया'नी आवाज़ जैसी कोई चीज़ हैमैग्नट की तरह कोई शय हैहवा सा कोई मोआमला हैकोई करंट हैजिस के लगने से भीनज़्म मरती नहींनज़्म की इंतिहा क्यों कि होती नहींख़त्म हो जाती है बीच में ही कहींजिस तरह कुछ जवाँ-मर्गया इंतिहा पर पहुँच कर भी तिश्ना ही रहती हैजैसेवो सब ज़िंदा लाशें कि जो मौत की डेट के बाद भी जी रही हैंदवा अपनी मुद्दत मुकम्मल किए एक बीमार गाहक की रह देखती हैये पानी की लालच बहुत बढ़ गई है जो टैंकी को भर कर लबालब बक़ाया दीवारों की बुनियाद में छोड़ देते हैंबिजली के आने का वक़्त आ भी जाए मगर इन की अपनी घड़ी हैनिजी दफ़्तरों के मुलाज़िम की छुट्टी के औक़ात होते हैं लेकिन उसे देर तक बैठने और बिठाने में कोई क़बाहत नहीं हैसितारों से आगे जहाँ और भी हैं
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