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नज़्म
जिधर नज़रें उठाता हूँ उधर चेहरे ही चेहरे हैं
मगर इन सब में इक बे-चेहरगी सी देखता हूँ मैं
अख़तर बस्तवी
नज़्म
सर्द रातों का हसीं इक ख़्वाब है चेहरा तिरा
क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा