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नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर
ये पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाई-गीरों की
हर चाल उलझाए जाते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सलाम मछली शहरी
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
पर्दा-हा-ए-ख़्वाब हो जाते हैं जिस से चाक चाक
मुस्कुरा कर अपनी चादर को हटा देती है ख़ाक