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नज़्म
फिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत की
ज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो इक मिज़राब है और छेड़ सकती है रग-ए-जाँ को
वो चिंगारी है लेकिन फूँक सकती है गुलिस्ताँ को
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मुँह में घुसती है सुरंगों के यकायक दौड़ कर
दनदनाती चीख़ती चिंघाड़ती गाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बूढ़ा पनवाड़ी उस के बालों में माँग है न्यारी
आँखों में जीवन की बुझती अग्नी की चिंगारी
मजीद अमजद
नज़्म
इक तरफ़ बजती हैं जोश-ए-ज़ीस्त की शहनाइयाँ
इक तरफ़ चिंघाड़ते हैं अहरमन के तब्ल-ओ-दफ़