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नज़्म
तुम क्यूँ उखाड़ते हो वो मुर्दे जो हैं गड़े
देखे नहीं हैं तुम ने जो चिकने थे वो घड़े
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
और दरियाओं को राह-ए-बर्फ़ में तब्दील होते भी न देखा
तजरबे मिट्टी के लोंदे गोल चिकने और सपाट
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
तन दूधिया चिकने हैं पर सीने तने अकड़े हैं सर
या कश्तियाँ चाँदी की हैं शफ़्फ़ाफ़ सत्ह-ए-आब पर
उजागर वारसी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जब चलते चलते रस्ते में ये गौन तिरी रह जावेगी
इक बधिया तेरी मिट्टी पर फिर घास न चरने आवेगी