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नज़्म
अजीब शय हैं चचा हमारे नहीं किसी की समझ में आए
लिए हैं प्याले में मुर्ग़ छोले उसी में डाली है रस-मलाई
अब्दुल क़ादिर
नज़्म
टिकियाँ ये आलूओं की इस पर मज़े के छोले
लज़्ज़त जो उन की पाए गूँगा ज़बान खोले
अब्दुल मतीन नियाज़
नज़्म
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए