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नज़्म
थी इक बकरे नुमा बुर्राक़ दाढ़ी उन के चेहरे पर
मगर फिर भी कबड्डी खेलते थे रात को अक्सर
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
इन की दाढ़ी चाँदी जैसी धूप पड़े तो चमके
लेकिन नटखट लड़की सा छुप जाए दिसम्बर बाबा
अब्दुर्रहीम नश्तर
नज़्म
बारिश की बूँदें गिरतीं पेड़ों पे रिम-झिम रिम-झिम
बरगद की दाढ़ी को पकड़े बच्चे पेंग बढ़ाते